जैकॉबाइट सिरीयन चर्च ने केरल में मालंकारा ऑर्थोडॉक्स सिरीयन चर्च के साथ चल रहे विवाद को अदालत के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाने की अपील की है। थिरुवनंतपुरम क्षेत्र के पहले मेट्रोपॉलिटन के रूप में मोर थियोफिलोस का अनुष्ठान 15 जुलाई को आयोजित होगा।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • जैकॉबाइट चर्च ने दीर्घकालिक विवाद के समाधान के लिए संवाद की मांग की।
  • मोर थियोफिलोस को थिरुवनंतपुरम क्षेत्र में पहले मेट्रोपॉलिटन के रूप में स्थापित किया जाएगा।
  • दोनों संप्रदायों को अलग‑अलग बहन संप्रदाय के रूप में मान्यता देने की अपील की गई।

केरल के थिरुवनंतपुरम में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में जैकॉबाइट सिरीयन चर्च के मीडिया सेल के प्रमुख और नई स्थापित क्षेत्र के मेट्रोपॉलिटन‑डिज़ाइनेट मोर थियोफिलोस ने कहा कि मालंकारा ऑर्थोडॉक्स सिरीयन चर्च के साथ चल रहा वैचारिक विवाद न्यायालय के फॉर्म में नहीं, बल्कि संवाद और सहमति के माध्यम से सुलझाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस विवाद को हल न करने से भविष्य की पीढ़ियों के लिए अन्याय होगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जैकॉबाइट और मालंकारा ऑर्थोडॉक्स चर्च के बीच का विभाजन 1912 में हुए अभिषेक विवाद से उत्पन्न हुआ, जिसके बाद कई दशकों तक भूमि, अधिकार और अधिकारिक मान्यता को लेकर मुकदमेबाजियों का सिलसिला चला। 1990 के दशक में उच्च न्यायालय ने कई निर्णय दिए, परन्तु दोनों पक्षों के बीच पूर्ण समाधान नहीं हो सका। इस कारण से दोनों संप्रदायों के अनुयायियों में सामाजिक तनाव बना रहा है।

न्यायिक लड़ाई से थक कर संवाद की ओर

मोर थियोफिलोस ने स्पष्ट किया कि जैकॉबाइट चर्च ने वर्षों से कई बार सरकार की पहल पर बैठकों का प्रस्ताव दिया है, परन्तु मालंकारा ऑर्थोडॉक्स की कठोर रुख ने इन प्रयासों को विफल कर दिया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि दोनों पक्ष अपने‑अपने मतभेदों को अलग‑अलग बहन संप्रदाय के रूप में मान्यता दें, जिससे दोनों को अपने‑अपने कार्यों में स्वतंत्रता मिले।

स्थापना समारोह का विवरण

15 जुलाई को सेंट पीटर जैकॉबाइट सिरीयन ऑर्थोडॉक्स सिमहसना कैथेड्रल में मोर थियोफिलोस के प्रथम मेट्रोपॉलिटन के रूप में अभिषेक किया जाएगा। इस समारोह में कैथोलिकॉस मोर बासेलियॉस जोसेफ I मुख्य रूप से अध्यक्षता करेंगे, जबकि अन्य मेट्रोपॉलिटन सह‑उपस्थापकों के रूप में भाग लेंगे। केरल के मुख्य मंत्री वी.डी. सातहीसन, विभिन्न मंत्री, संसद के सदस्य, विभिन्न ईसाई संप्रदायों के प्रमुख और कई सामाजिक व्यक्तियों की उपस्थिति की उम्मीद है।

भविष्य की दिशा

यदि दोनों पक्ष इस बार संवाद के द्वार खोलते हैं, तो यह न केवल धार्मिक संगति को पुनर्स्थापित करेगा, बल्कि सामाजिक शांति और सांस्कृतिक विविधता के समर्थन में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायालयीय लम्बी लड़ाई की जगह संवाद‑आधारित समाधान से केरल की सामाजिक संरचना को स्थिरता मिलेगी और भविष्य की पीढ़ियों को एक अधिक सामंजस्यपूर्ण धार्मिक माहौल मिलेगा।