आयोध्या में राम जनमभूमी के प्रबंधन को लेकर विवाद तेज़। महंत बाबा धर्मदास ने सरकारी हस्तक्षेप को अस्वीकार कर पारम्परिक साधु प्रथा की माँग की, जबकि सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को वित्तीय अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच सुनवाई करेगा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- महंत बाबा धर्मदास ने सरकारी नियंत्रण को अस्वीकार किया
- सुप्रीम कोर्ट 13 जुलाई को वित्तीय जांच की सुनवाई करेगा
- ट्रस्ट में पारम्परिक साधु प्रबंधन की माँग बढ़ी
अयोध्या में स्थित श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रबंधन को लेकर अतीत‑से चल रहे विवाद ने फिर से सुर्ख़ियों में जगह बना ली है। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने राम मंदिर निर्माण को मंजूरी दी, जिसके बाद ट्रस्ट का गठन हुआ और मंदिर निर्माण के लिए निधियों का संकलन शुरू हुआ। लेकिन हाल ही में दान‑धन और आभूषणों के कथित चोरी‑छिपी के आरोपों ने इस ट्रस्ट को गंभीर जांच के दायरे में ला दिया है।
पारम्परिक प्रबंधन की माँग
श्री राम जन्मभूमि आंदोलन के शुरुआती याचिकाकर्ता और महंत बाबा धर्मदास, जो हनुमानगढ़ी के महंत भी हैं, ने रविवार को स्पष्ट बयान दिया: “हम राम जन्मभूमि पर किसी भी सरकारी नियंत्रण को नहीं मानेंगे। हमें यहाँ साधु‑परम्परा को बनाए रखना है।” उनका यह बयान अनसुलझे वित्तीय मामलों के बीच आया, जिससे इस मुद्दे की धार्मिक‑राजनीतिक जटिलता और भी स्पष्ट हो गई।
सरकारी पक्ष की प्रतिक्रिया
राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष, नृपेंद्र मिश्रा, ने इस विवाद को शांत करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि ट्रस्ट का संरचनात्मक स्वरूप अपरिवर्तित रहेगा और प्रस्तावित सीईओ केवल एक अतिरिक्त लिंक होगा, जिसका कार्य ट्रस्ट की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना होगा। मिश्रा ने यह भी कहा कि “कोई भी निर्णय भक्तों को मध्य में रखकर ही लिया जाएगा, और सरकारी हस्तक्षेप का कोई स्थान नहीं होगा।”
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
इन घटनाओं के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई को एक सुनवाई निर्धारित की है, जिसमें ट्रस्ट के वित्तीय मामलों की स्वतंत्र जांच की मांग वाले याचिकाओं पर विचार किया जाएगा। यदि न्यायालय ने स्वतंत्र जाँच का आदेश दिया, तो यह धार्मिक संस्थानों की वित्तीय पारदर्शिता के लिए एक नया मानक स्थापित कर सकता है।
भविष्य की संभावनाएँ
ट्रस्ट ने पेशेवर सीईओ नियुक्त करके प्रबंधन में सुधार का वादा किया है, जबकि जनरल सचिव चम्पत राय ने इस्तीफा देकर इस परिवर्तन को साकार करने में सहयोग दिया। विपक्ष भी इस मुद्दे को आगामी मानसून सत्र में उठाने की योजना बना रहा है, जिससे यह विवाद संसद तक विस्तार कर सकता है। इस प्रकार, धार्मिक अधिकार, सरकारी नियमन और सार्वजनिक जवाबदेही के बीच का संतुलन अब एक निर्णायक मोड़ पर है।