छत्तीसगढ़ में पारंपरिक आस्था के साथ कमरछठ यानी हलषष्ठी का व्रत मनाया जा रहा है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए निर्जला उपवास रखकर विशेष पूजा-अर्चना कर रही हैं। इस व्रत में बिना हल चले उगने वाले अनाजों और भैंस के दूध का ही प्रयोग करने की अनूठी परंपरा है।
- कमरछठ (हलषष्ठी) का व्रत संतान की लंबी आयु और समृद्धि के लिए रखा जाता है।
- इस व्रत में हल से जोती गई भूमि पर उगे अन्न और गाय के दूध का उपयोग पूरी तरह वर्जित है।
- पूजा के बाद बच्चों की पीठ पर 'पोता' लगाने की पारंपरिक रस्म निभाई जाती है।
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा सहित पूरे प्रदेश में पारंपरिक आस्था और उत्साह के साथ कमरछठ (हलषष्ठी) का व्रत मनाया जा रहा है। माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए यह कठिन निर्जला व्रत रख रही हैं। इस पर्व को हलछठ, हरछठ और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह से ही निर्जला रहकर व्रत का संकल्प लेती हैं और शाम को विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं।
कमरछठ के दिन पूजा के बाद घर लौटकर बच्चों की पीठ पर गीले कपड़े या 'पोता' लगाने की एक बेहद खास पारंपरिक रस्म निभाई जाती है। माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और समृद्धि की कामना करते हुए उन्हें आशीर्वाद देती हैं। इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता इसके कड़े नियम और खान-पान की अनूठी परंपराएं हैं, जो इसे अन्य सभी हिंदू व्रतों से अलग बनाती हैं।
कमरछठ व्रत के कड़े नियम और खान-पान की परंपरा
हलषष्ठी व्रत में हल से जोती गई भूमि से उत्पन्न होने वाले किसी भी अन्न या फल का सेवन वर्जित माना जाता है। इस दिन केवल प्राकृतिक रूप से तालाबों या बिना हल चलाए उगने वाले अनाजों का ही उपयोग किया जाता है। मुख्य रूप से पसही या तीना के चावल, सिंघाड़ा, और मखाना का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा, छरहर भाजी और पसहर चावल का इस दिन विशेष महत्व होता है क्योंकि इन्हें उगाने के लिए कभी हल नहीं चलाया जाता।
इसके साथ ही, डेयरी उत्पादों को लेकर भी इस व्रत में एक विशेष धार्मिक नियम है। इस दिन गाय के दूध, दही या उससे बने घी का उपयोग पूरी तरह से वर्जित होता है। इसके स्थान पर केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, इस पर्व पर छह प्रकार की हरी भाजियों का विशेष भोग तैयार किया जाता है, जिसमें मुख्य रूप से मुनगा, चरोटा, मखना, कुंदरी, कांदा और बरबट्टी शामिल हैं।
ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हलषष्ठी का त्योहार भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र 'हल' और 'मुसल' है, यही कारण है कि इस दिन को हलषष्ठी कहा जाता है। चूंकि खेती में हल का उपयोग किया जाता है, इसलिए बलराम जी के सम्मान में इस दिन हल से जोती गई भूमि के अन्न का त्याग किया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और कृषि प्रधान राज्य छत्तीसगढ़ में इसका महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows... कमरछठ जैसी पारंपरिक प्रथाएं केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्य और प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को भी दर्शाती हैं। बिना हल चलाए उगने वाले अनाजों और जंगली भाजियों का महत्व हमें जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की याद दिलाता है। यह त्योहार आधुनिक युग में भी प्राचीन कृषि पद्धतियों और पारिवारिक मूल्यों को जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम है।
"कमरछठ का व्रत मातृत्व की पराकाष्ठा, प्रकृति के प्रति सम्मान और प्राचीन कृषि संस्कृति के संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण है।"
| खाद्य श्रेणी | क्या खाएं (स्वीकार्य) | क्या न खाएं (वर्जित) |
|---|---|---|
| अनाज | पसही चावल (तीना का चावल) | गेहूं, सामान्य चावल (हल से जुते) |
| डेयरी उत्पाद | भैंस का दूध, दही और घी | गाय का दूध, दही और घी |
| सब्जियां | छह प्रकार की प्राकृतिक भाजियां (मुनगा, चरोटा आदि) | हल से जोती गई भूमि पर उगी सब्जियां |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: कमरछठ व्रत में गाय के दूध का उपयोग क्यों नहीं किया जाता?
उत्तर: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन केवल भैंस के दूध और उससे बने उत्पादों का ही उपयोग करने का नियम है, ताकि गाय और उसके बछड़े को इस दिन विश्राम मिल सके और कृषि संस्कृति का सम्मान किया जा सके।
प्रश्न 2: बच्चों की पीठ पर 'पोता' लगाने की रस्म का क्या महत्व है?
उत्तर: इस रस्म के तहत माताएं अपने बच्चों की पीठ पर गीले कपड़े (पोता) से थपकी देती हैं, जिसे भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद माना जाता है, जिससे बच्चों को लंबी आयु और सुरक्षा मिलती है।