जैन समुदाय का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व 'पर्युषण' 8 सितंबर से शुरू हो रहा है। यह पर्व आत्मशुद्धि, अहिंसा और क्षमा का संदेश देता है, जिसमें श्रद्धालुओं को कड़े संयम का पालन करना होता है।

वीडियो लोड हो रहा है...
  • पर्युषण पर्व 8 सितंबर से 15 सितंबर 2026 तक मनाया जाएगा।
  • श्रद्धालु कंदमूल (जमीन के नीचे उगने वाली सब्जियां) का त्याग करेंगे।
  • पर्व का मुख्य उद्देश्य आत्म-चिंतन, तपस्या और सभी जीवों के प्रति क्षमा भाव रखना है।

जैन धर्म के अनुयायियों के लिए पर्युषण महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने का एक गहन अवसर है। इस वर्ष यह महापर्व 8 सितंबर 2026 से प्रारंभ होकर 15 सितंबर 2026 तक चलेगा। इन आठ दिनों में श्रद्धालु सांसारिक मोह-माया को त्यागकर ध्यान, उपवास और स्वाध्याय के माध्यम से अपने भीतर झांकने का प्रयास करते हैं।

पर्युषण का अर्थ है 'निकट आना'। इसका तात्पर्य है कि आत्मा को परमात्मा के निकट लाना। इस अवधि के दौरान श्रद्धालु केवल भोजन का त्याग नहीं करते, बल्कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि पर विशेष ध्यान देते हैं। जैन परंपरा के अनुसार, श्वेतांबर समाज इसे आठ दिनों के पर्युषण पर्व के रूप में मनाता है, जबकि दिगंबर समाज इसे दस दिनों के 'दशलक्षण पर्व' के रूप में मनाता है।

पर्युषण महापर्व के 5 अनिवार्य नियम

इस महापर्व की पवित्रता बनाए रखने के लिए श्रद्धालुओं को निम्नलिखित कड़े नियमों का पालन करना होता है:

  1. कंदमूल का त्याग: जमीन के अंदर उगने वाली सब्जियां जैसे आलू, गाजर, मूली, प्याज और लहसुन का सेवन पूरी तरह वर्जित होता है, ताकि सूक्ष्म जीवों की रक्षा की जा सके।
  2. सूर्यास्त से पूर्व भोजन: रात के समय भोजन करना वर्जित है। सूर्यास्त के बाद केवल जल या जूस का सेवन किया जा सकता है और समय का उपयोग ध्यान में लगाया जाता है।
  3. वाणी और मन पर नियंत्रण: किसी की निंदा न करना, अपशब्दों का प्रयोग न करना और ईर्ष्या से दूर रहना अनिवार्य है।
  4. सादगी और ब्रह्मचर्य: दिखावे वाले वस्त्रों का त्याग कर साधारण जीवन जीना और शारीरिक सुख-सुविधाओं से दूरी बनाना इस पर्व का मूल है।
  5. अहिंसा का परम पालन: किसी भी जीव-जंतु को हानि न पहुँचाना। चलते-फिरते या बोलते समय भी इस बात का ध्यान रखा जाता है कि किसी सूक्ष्म जीव को कष्ट न हो।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, आधुनिक युग में जहाँ तनाव और भौतिकवाद बढ़ रहा है, पर्युषण जैसे पर्व मानसिक शांति और नैतिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यह पर्व केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी 'क्षमावाणी' की परंपरा वैश्विक स्तर पर शांति और सह-अस्तित्व का संदेश देती है।

"पर्युषण पर्व का वास्तविक सार बाहरी उपवास में नहीं, बल्कि आंतरिक अहंकार के त्याग और क्षमा की भावना में निहित है।"
क्या आप जानते हैं?: जैन धर्म में पर्युषण के अंत में 'मिच्छामी दुक्कड़म' कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि यदि मैंने जाने-अनजाने में आपका दिल दुखाया हो, तो मैं आपसे क्षमा मांगता हूँ।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: श्वेतांबर और दिगंबर परंपराओं में पर्युषण कैसे अलग है?
उत्तर: श्वेतांबर समुदाय इसे 8 दिनों के पर्युषण पर्व के रूप में मनाता है, जबकि दिगंबर समुदाय इसे 10 दिनों के दशलक्षण पर्व के रूप में मनाता है।

प्रश्न 2: इस दौरान कंदमूल क्यों नहीं खाए जाते?
उत्तर: जैन धर्म में अहिंसा सर्वोपरि है। माना जाता है कि कंदमूल (जैसे आलू, प्याज) को उखाड़ने से जमीन में मौजूद अनगिनत सूक्ष्म जीवों की हत्या होती है।