भाद्रपद मास की पिठोरी अमावस्या संतान की दीर्घायु और पितरों की शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जानिए इस वर्ष स्नान-दान का सटीक समय और कुशा के महत्व से जुड़ी पौराणिक कथाएं।

  • पिठोरी अमावस्या 10 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।
  • स्नान-दान का शुभ मुहूर्त सुबह 4:31 से 5:17 तक रहेगा।
  • संतान की रक्षा के लिए माताएं 64 योगिनियों की आटे से मूर्तियां बनाकर पूजा करती हैं।
  • इस दिन कुशा घास का संग्रहण करना पूरे वर्ष के लिए शुभ माना जाता है।

हिंदू धर्म में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या का विशेष महत्व है, जिसे पिठोरी अमावस्या या कुशग्रहणी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। यह दिन न केवल पितरों के तर्पण और उनकी आत्मा की शांति के लिए समर्पित है, बल्कि माताओं के लिए अपनी संतान की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करने का एक पावन अवसर भी है।

तिथि और शुभ मुहूर्त 2026

द्रिक पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या की तिथि 10 सितंबर को सुबह 10 बजकर 33 मिनट पर प्रारंभ होगी और इसका समापन 11 सितंबर को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा। उदयातिथि के महत्व को देखते हुए, पिठोरी अमावस्या का व्रत और पूजन 10 सितंबर को ही संपन्न किया जाएगा।

धार्मिक अनुष्ठानों के लिए स्नान-दान का समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस वर्ष स्नान-दान का शुभ मुहूर्त सुबह 4 बजकर 31 मिनट से सुबह 5 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। इस समय पवित्र नदियों में स्नान और जरूरतमंदों को दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, पिठोरी अमावस्या केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह मनोवैज्ञानिक रूप से माता और संतान के बीच के अटूट बंधन को सुदृढ़ करता है। साथ ही, कुशा घास का संग्रहण प्राचीन भारतीय परंपराओं में ऊर्जा संरक्षण (Energy Conservation) के विज्ञान को दर्शाता है, जो आध्यात्मिक साधना में सहायक होता है।

पूजन विधि और महत्व

इस दिन माताएं सूर्योदय से पूर्व स्नान कर व्रत का संकल्प लेती हैं। पूजा की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि चावल के आटे (पीठ) से 64 योगिनियों और सप्तमातृकाओं की प्रतीकात्मक मूर्तियां बनाई जाती हैं। इन्हें लाल वस्त्र बिछी चौकी पर स्थापित कर गणेश पूजन के बाद रोली, हल्दी और कुमकुम अर्पित किया जाता है। अंत में खीर-पूरी का भोग लगाकर कथा सुनी जाती है और ब्राह्मणों को दान दिया जाता है।

"कुशग्रहणी अमावस्या पर एकत्र की गई कुशा पूरे वर्ष के धार्मिक कार्यों में पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।"

कुशा का पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व

कुशा घास का उपयोग पूजा और साधना में आसन के रूप में किया जाता है। मान्यता है कि साधना के दौरान शरीर में उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा को पृथ्वी में विलीन होने से रोकने के लिए कुशा का आसन एक इंसुलेटर की तरह कार्य करता है। मत्स्य पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया था, तब उनके शरीर से गिरे बालों से कुशा की उत्पत्ति हुई, जिससे इसे अत्यंत पवित्र माना गया।

क्या आप जानते हैं?: पिठोरी अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाने और दीपक जलाने से शनि और राहु के दोषों का शमन होता है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: पिठोरी अमावस्या को 'कुशग्रहणी अमावस्या' क्यों कहते हैं?
उत्तर: क्योंकि इस दिन साल भर पूजा-पाठ में उपयोग होने वाली कुशा घास को एकत्रित किया जाता है।

प्रश्न 2: क्या इस दिन शिवजी का अभिषेक करना फलदायी है?
उत्तर: हाँ, जिन जातकों की कुंडली में राहु-शनि का दोष है, उनके लिए इस दिन शिवजी का जलाभिषेक करना अत्यंत शुभ होता है।