याकोबाइट सीरियन क्रिश्चियन चर्च ने ऑर्थोडॉक्स गुट द्वारा तैयार की गई प्रतिनिधि सूची में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। चर्च के मीडिया सेल के अध्यक्ष कुरियाकोस मोर थियोफिलोस ने निष्पक्ष सत्यापन की मांग की है।

  • याकोबाइट चर्च ने ऑर्थोडॉक्स गुट द्वारा बनाई गई प्रतिनिधि सूची को अवैध बताया है।
  • आरोप है कि अप्रासंगिक पुजारियों को बहुमत वाले चर्चों में नियुक्त किया गया है।
  • चर्च ने सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ चेतावनी दी है।
  • सरकार से इस विवाद को सुलझाने के लिए नए कानून बनाने की मांग की गई है।

कोच्चि: याकोबाइट सीरियन क्रिश्चियन चर्च ने ऑर्थोडॉक्स गुट द्वारा तैयार की गई सदस्यों और प्रतिनिधियों की सूची में कथित अनियमितताओं के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया है। गुरुवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में, चर्च ने आरोप लगाया कि यह सूची पारदर्शिता के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है और चर्च के लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने का प्रयास है।

याकोबाइट चर्च के मीडिया सेल के अध्यक्ष, कुरियाकोस मोर थियोफिलोस ने कहा कि सूची में गंभीर विसंगतियां पाई गई हैं। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि उन चर्चों में, जहां याकोबाइट गुट के सदस्यों का भारी बहुमत है, ऐसे पुजारियों को नियुक्त करने का प्रयास किया गया है जिनका संबंधित पैरिश (Parish) से बहुत कम संबंध है। इसके अलावा, एक ही पुजारी को कई अलग-अलग पैरिश में विकार्ड के रूप में नियुक्त किए जाने के मामले भी सामने आए हैं।

सत्ता के केंद्रीकरण का प्रयास

चर्च का आरोप है कि ये कदम सत्ता को 'केंद्रीकृत' करने के लिए उठाए जा रहे हैं, जो 1876 के मुलांतुरुथी सिनोड (Synod of Mulanthuruty) के बाद अपनाए गए सहभागी दृष्टिकोण के बिल्कुल विपरीत है। थियोफिलोस ने कहा कि चर्च इस तरह के किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं करेगा जो सदियों पुरानी परंपराओं और लोकतांत्रिक भागीदारी को दरकिनार करता है।

चर्च के भीतर पारदर्शिता की कमी न केवल विश्वास को तोड़ती है, बल्कि कानूनी जटिलताओं को भी जन्म देती है।

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह विवाद केवल प्रशासनिक नहीं है, बल्कि यह चर्च के ऐतिहासिक नियंत्रण और पहचान से जुड़ा एक गहरा संघर्ष है। चर्च ने चेतावनी दी है कि गलत दस्तावेजों का उपयोग अदालतों और अन्य अधिकारियों को गुमराह करने के लिए किया जा रहा है, जैसा कि 2002 में परुमाला में भी देखा गया था।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यह विवाद दशकों से चला आ रहा है, जो मुख्य रूप से ऑर्थोडॉक्स और याकोबाइट गुटों के बीच अधिकार क्षेत्र और चर्च प्रबंधन को लेकर है। मुलांतुरुथी सिनोड (1876) ने चर्च के शासन में स्थानीय भागीदारी को महत्वपूर्ण बनाया था, जिसे अब वर्तमान विवादों में चुनौती दी जा रही है।

चर्च ने यह भी मुद्दा उठाया कि मुलांतुरुथी के ऐतिहासिक चर्च से 2,500 से अधिक याकोबाइट सदस्यों को बाहर कर दिया गया है, जो एक गंभीर अन्याय है। थियोफिलोस ने सरकार से आग्रह किया है कि वह इस पुराने विवाद के स्थायी समाधान के लिए एक विशेष कानून बनाए।

Frequently Asked Questions

1. याकोबाइट चर्च का मुख्य आरोप क्या है?
मुख्य आरोप यह है कि ऑर्थोडॉक्स गुट ने प्रतिनिधि सूची में हेरफेर किया है और अप्रासंगिक पुजारियों को महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया है।

2. मुलांतुरुथी सिनोड का क्या महत्व है?
1876 का मुलांतुरुथी सिनोड चर्च के शासन में सहभागी और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण स्थापित करने के लिए जाना जाता है।

Did You Know?: 1876 का मुलांतुरुथी सिनोड केरल के ईसाई इतिहास में शासन प्रणाली को बदलने वाला एक महत्वपूर्ण मोड़ था।