महाराष्ट्र के लातूर और धरणशिव जिलों में बड़ी घोंघों ने सोयाबीन के नए अंकुरों को निशाना बनाया है। फसल के नुकसान को रोकने के लिए अधिकारियों ने धातु‑डिहाइड पेललेट और रात में घोंघा पकड़ने की सलाह दी है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • लातूर‑धरणशिव में बड़े घोंघे सोयाबीन के अंकुरों को रात में खा रहे हैं
  • धातु‑डिहाइड पेललेट और गहरी जुताई से कीट नियंत्रण की सिफ़ारिश
  • समुदायिक प्रयास और रात की निगरानी फसल बचाने में अहम

महाराष्ट्र के माराठवाड़ क्षेत्र में, लातूर और धरणशिव जिलों के पाँच‑सात गाँवों में इस साल की बरसात के दौरान एक असामान्य कीट समस्या उभरी है। बड़े आकार के घोंघे सोयाबीन के अभी-अभी उगे हुए पौधों पर हमला कर रहे हैं, जिससे किसानों को शुरुआती चरण में ही 70‑80% तक की हानि का सामना करना पड़ रहा है।

पृष्ठभूमि और मौसमी स्थिति

पिछले कुछ महीनों में भारत के कई हिस्सों में अनियमित बरसात और जलभराव की रिपोर्टें सामने आई हैं। महाराष्ट्र में जल-भरी जमीन, नदियों के किनारे और तालाबों के पास स्थित खेत इन परिस्थितियों के कारण घोंघों के प्रजनन के लिए आदर्श माहौल बनाते हैं। युवा सोयाबीन के कोमल पत्ते इन कीटों के लिए तुरंत उपलब्ध भोजन बन जाते हैं।

घोंघा हमला: रात में बढ़ती खतरा

कृषि अधिकारी महेश तीर्थकर, सुपरिंटेंडेंट एग्रीकल्चर ऑफिसर, ने बताया कि घोंघे सूर्यास्त के बाद सक्रिय होते हैं और लगभग 9 बजे से लेकर सुबह 5 तक खेतों में घुसते हैं। एक स्थानीय किसान, बालिराम अबरबंदे, ने कहा कि केवल तीन एकड़ के खेत में उनका 75% सोयाबीन नष्ट हो गया। इस कारण से कई परिवार अब रात तक जागे रहते हैं, घोंघे पकड़ने और उन्हें नष्ट करने के लिए सामूहिक प्रयास कर रहे हैं।

प्रत्येक कदम: नियंत्रण उपाय

अधिकारी धातु‑डिहाइड (metaldehyde) बॉल्स को खेत की सीमाओं पर रखने की सलाह दे रहे हैं, जो घोंघे के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर मार डालता है। साथ ही, गहरी जुताई (4‑5 इंच) करके अंडे को मिट्टी में दबा देना और अगली बुवाई से पहले कीट को समाप्त करना सुझाया गया है। कई गाँवों में रात के समय सामुदायिक टीमें गठित होकर घोंघे एकत्रित कर उन्हें later destroy किया जा रहा है।

भविष्य की दिशा और संभावित प्रभाव

यदि इस कीट प्रकोप को नियंत्रित नहीं किया गया तो सोयाबीन की उत्पादन क्षमता में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे किसान की आय और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकते हैं। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि दीर्घकालिक समाधान के लिए जैविक नियंत्रण, जैसे कि प्राकृतिक शत्रु (जैसे कीट‑शत्रु पक्षी) का उपयोग, और जल‑व्यवस्थापन उपायों को अपनाया जाए।