पेरू के तट से उठती गर्म जलधारा भारतीय खेतों पर सीधा असर डालती है। गणितज्ञ गिल्बर्ट वॉकर और उनके भारतीय सहयोगियों ने इस जटिल जलवायु संबंध को कैसे उजागर किया, यह कहानी में बताया गया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- एल नीनो की गर्म जलधारा भारतीय मानसून के पैटर्न को बदलती है।
- गिल्बर्ट वॉकर ने दक्षिणी दोलन (Southern Oscillation) की खोज की, जिसने जलवायु विज्ञान में क्रांति लाई।
- भारतीय राजनैतिक‑आर्थिक इतिहास में मानसून की भविष्यवाणी जीवन‑और‑मृत्यु का सवाल था।
पेरू के तट के पास एक गर्म जलधारा—जिसे स्थानीय मछुआरों ने ‘क्राइस्ट चाइल्ड’ कहा—दुर्लभ रूप से भारतीय कृषि पर गहरा प्रभाव डालती है। यह जलधारा, वैज्ञानिक शब्दों में एल नीनो, प्रशांत महासागर के सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि लाती है, जिससे वायुमंडलीय दबाव में परिवर्तन होता है और अंततः भारतीय उपमहाद्वीप में बरसात के पैटर्न को प्रभावित करती है।
इतिहास में एल नीनो का परिचय
१९वीं सदी के उत्तरार्ध में भारत में बार‑बार आए अकाल ने मानसून की सटीक भविष्यवाणी को राष्ट्रीय प्राथमिकता बना दिया। उस समय के मौसम विज्ञानी सूर्यकेन्द्रों (sunspots) और चक्रों (cycles) को समझने की कोशिश में लगे थे, पर कोई ठोस सिद्धांत नहीं मिल पा रहा था। उसी दौरान ऑस्ट्रेलियाई खगोलशास्त्री जेम्स रॉबर्टसन ने देखा कि दूर‑दूर के सूखे एक ही समय पर होते हैं, जिससे एक गुप्त अंतरराष्ट्रीय संबंध का संकेत मिला।
गिल्बर्ट वॉकर की क्रांतिकारी खोज
कैम्ब्रिज के गणितज्ञ गिल्बर्ट वॉकर, जो पक्षियों, बांसुरी, आइस‑स्केटिंग और बूमरैंग के शौकीन थे, ने इस रहस्य को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय क्लर्कों, विशेषकर हेमा राज की विस्तृत आँकड़ों की मदद से प्रशांत महासागर के दो किनारों पर वायुमंडलीय दबाव के उलट‑फेर (Southern Oscillation) को परिभाषित किया। इस खोज ने यह सिद्ध किया कि एल नीनो केवल एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि एक वैश्विक जलवायु तंत्र है जो भारतीय मानसून को सीधे प्रभावित करता है।
आधुनिक अनुप्रयोग और भविष्य की चुनौतियाँ
आज के मौसम मॉडलों में एल नीनो की भविष्यवाणी को एक प्रमुख इनपुट माना जाता है। वैज्ञानिक सटीकता में सुधार के साथ, किसान अब पूर्वानुमानित सूखे या अधिक वर्षा के लिए तैयार हो सकते हैं, जिससे फसल नुकसान को कम किया जा सकता है। फिर भी, जलवायु परिवर्तन के कारण एल नीनो की आवृत्ति और तीव्रता में परिवर्तन की संभावना है, जो नई नीति‑निर्माण और जल संसाधन प्रबंधन की मांग करती है।
समापन
एल नीनो की कहानी सिर्फ एक जलवायु घटना नहीं, बल्कि विज्ञान, इतिहास और सामाजिक जीवन के बीच जटिल बंधन का प्रतीक है। गिल्बर्ट वॉकर और उनके भारतीय सहयोगियों की मेहनत ने हमें इस बंधन को समझने का पहला कदम दिया, और भविष्य में इस ज्ञान को कैसे लागू किया जाए, यही हमारे सामने सबसे बड़ा चुनौती है।