हिमालय क्षेत्र में बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियर तेजी से अस्थिर होकर 'हैंगिंग ग्लेशियर' में बदल रहे हैं। हालिया शोध के अनुसार, गढ़वाल हिमालय की अलकनंदा घाटी में 219 ऐसे अस्थिर ग्लेशियरों की पहचान की गई है, जो निचले इलाकों में भारी तबाही ला सकते हैं।

  • हैंगिंग ग्लेशियर खड़ी ढलानों पर टिके बर्फ के वे द्रव्यमान होते हैं, जो कभी भी टूटकर गिर सकते हैं और भीषण हिमस्खलन का कारण बन सकते हैं।
  • एक वैज्ञानिक शोध में गढ़वाल हिमालय की अलकनंदा बेसिन में ऐसे 219 अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है।
  • साल 2030 तक इन संवेदनशील क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को 120% और आबादी को 17% अधिक खतरे का सामना करना पड़ सकता है।

नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ ने भारत के पिछले डेढ़ दशक के कम से कम चार बड़े हादसों की याद दिला दी है। इन सभी घटनाओं में पर्वतीय नदियों में अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ा गया था। लेकिन अब भारत के लिए खतरे की घंटी और तेज हो गई है। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है और क्षेत्रीय वर्षा का पैटर्न बदल रहा है, हिमालयी ग्लेशियरों की स्थिरता तेजी से कम हो रही है। इस अस्थिरता के कारण कई ग्लेशियर अब 'हैंगिंग ग्लेशियर' (Hanging Glaciers) में तब्दील हो रहे हैं, जो खड़ी ढलानों पर लटके हुए बर्फ के विशाल खंड होते हैं और कभी भी टूटकर गिर सकते हैं।

अप्रैल 2026 में प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका Nature में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, गढ़वाल हिमालय की अलकनंदा बेसिन में कुल 219 हैंगिंग ग्लेशियर मौजूद हैं। इस अध्ययन में पाया गया कि इस अस्थिर बर्फ का लगभग एक-तिहाई हिस्सा ऊपरी अलकनंदा बेसिन में केंद्रित है। यह शोध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) भुवनेश्वर के स्कूल ऑफ अर्थ, ओशन एंड क्लाइमेट साइंसेज के असीम सत्तार और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) बेंगलुरु के दिवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के नंदू कृष्णन और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया है।

कैसे बनते हैं हैंगिंग ग्लेशियर?

अध्ययन के अनुसार, तेजी से बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तनशीलता के कारण हिमालयी ग्लेशियर तेजी से 'ज्यामितीय और गतिशील अस्थिरता' प्रदर्शित कर रहे हैं। अस्थिर ग्लेशियर वे होते हैं जिनका वेग बहुत कम समय में अप्रत्याशित रूप से बदल जाता है। इसके परिणामस्वरूप बर्फ का पुनर्वितरण होता है, जिससे उनके ज्यामितीय, संरचनात्मक और विवर्तनिक ढांचे में बदलाव आता है। यह अस्थिरता अंततः खड़ी ढलानों पर लटके हुए ग्लेशियरों के निर्माण का कारण बनती है। आल्प्स पर्वत श्रृंखला में तो इनका व्यापक अध्ययन हुआ है, लेकिन हिमालय में बेसिन-स्तर पर ऐसे आकलन अब तक बेहद सीमित रहे हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि हिमालयी घाटियों में तेजी से हो रहा अनियोजित शहरीकरण और बुनियादी ढांचे का विकास, जलवायु परिवर्तन के इस नए खतरे के साथ मिलकर एक बड़े संकट को जन्म दे रहा है। अलकनंदा बेसिन भारत के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों (जैसे बद्रीनाथ) और महत्वपूर्ण पनबिजली परियोजनाओं का घर है। यदि इन ग्लेशियरों की निगरानी के लिए तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में होने वाली जनहानि और आर्थिक नुकसान की भरपाई करना असंभव होगा।

विशेषताहैंगिंग ग्लेशियर (Hanging Glacier)घाटी ग्लेशियर (Valley Glacier)
ढलान का स्तरअत्यधिक खड़ी ढलानों पर स्थितधीमी ढलान वाली घाटियों में स्थित
स्थिरताअत्यधिक अस्थिर; अचानक टूटने की आशंकाअपेक्षाकृत स्थिर; दशकों में धीमी गति
मुख्य खतराभीषण हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ (GLOF)धीरे-धीरे पिघलना और दीर्घकालिक जल स्तर में बदलाव

यदि ये हैंगिंग ग्लेशियर टूटते हैं, तो इसके परिणाम भयावह हो सकते हैं। कंप्यूटर सिमुलेशन से संकेत मिलता है कि उत्तराखंड के बद्रीनाथ-माना क्षेत्र में इसके कारण आने वाले हिमस्खलन की ऊंचाई 50 मीटर से अधिक हो सकती है। इतनी भीषण आपदा प्रमुख बस्तियों और बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से निगल सकती है। इसके अलावा, इन ग्लेशियरों के टूटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी माध्यमिक आपदाएं भी आ सकती हैं, जो निचले इलाकों में प्रलय ला सकती हैं।

"यह अध्ययन केवल एक चेतावनी नहीं बल्कि एक पुकार है कि हमें जीवाश्म ईंधन के युग को समाप्त कर कार्बन-मुक्त ऊर्जा की ओर तत्काल कदम बढ़ाना होगा।" - पाम पियर्सन, निदेशक, आईसीसीआई

अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि अलकनंदा बेसिन में जोखिम का स्तर अगले दशक में काफी बढ़ जाएगा। साल 2000 की तुलना में 2030 तक इस क्षेत्र में जोखिम वाले भवनों और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में 120% की वृद्धि होने का अनुमान है। वहीं, इन संवेदनशील क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की संख्या में भी 17% की बढ़ोतरी होने की आशंका है। यह स्थिति पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और सुनियोजित भूमि-उपयोग योजना की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।

क्या आप जानते हैं?: हैंगिंग ग्लेशियरों का टूटना केवल हिमस्खलन तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह पूरी नदी प्रणालियों को अवरुद्ध कर क्षणिक झीलें बना सकता है जो बाद में विनाशकारी बाढ़ का रूप ले लेती हैं।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: अलकनंदा बेसिन में कुल कितने हैंगिंग ग्लेशियर हैं?
उत्तर: हालिया शोध के अनुसार, गढ़वाल हिमालय की अलकनंदा बेसिन में कुल 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है, जो लगभग 71.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करते हैं।

प्रश्न 2: इन ग्लेशियरों के टूटने से सबसे बड़ा खतरा क्या है?
उत्तर: इनके टूटने से 50 मीटर से भी ऊंचे हिमस्खलन आ सकते हैं और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के कारण बद्रीनाथ-माना जैसे इलाकों में भारी तबाही मच सकती है।