शोधकर्ताओं ने इडुक्की के मथिकेट्टन शोला नेशनल पार्क में 'बुएलिया महाराजेंसिस' नामक लाइकेन की एक नई प्रजाति की खोज की है। यह खोज इस संरक्षित क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिक स्वास्थ्य को रेखांकित करती है।
- मथिकेट्टन शोला नेशनल पार्क में लाइकेन की नई प्रजाति 'बुएलिया महाराजेंसिस' की खोज की गई।
- यह प्रजाति 1,351 मीटर की ऊंचाई पर चट्टानी सतहों (saxicolous) पर उगती है।
- यह इस नेशनल पार्क में खोजी गई लाइकेन की चौथी नई प्रजाति है।
- खोज में महाराजा कॉलेज, केएफआरआई और सीएसआईआर-एनबीआरआई के विशेषज्ञों ने सहयोग किया।
केरल के इडुक्की जिले में स्थित मथिकेट्टन शोला नेशनल पार्क एक बार फिर वैज्ञानिक जगत के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। हाल ही में एक पांच सदस्यीय शोध दल ने यहाँ लाइकेन की एक नई प्रजाति, Buellia maharajensis, की खोज की है। यह महत्वपूर्ण खोज अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'ताइवानिया' (Taiwania) में प्रकाशित की गई है, जो इस क्षेत्र की अद्वितीय पारिस्थितिकी को प्रमाणित करती है।
यह नई प्रजाति एक 'सैक्सिकोलस' (saxicolous) लाइकेन है, जिसका अर्थ है कि यह सीधे चट्टानों की सतह पर विकसित होती है। शोधकर्ताओं ने इसे लगभग 1,351 मीटर की ऊंचाई पर दर्ज किया है। इस खोज का नेतृत्व सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर स्टीफन सेक्वेरा, वरिष्ठ शोध अध्येता अश्वति अनिलकुमार और अरुण क्रिस्टी ने किया, जो महाराजा कॉलेज, एर्नाकुलम के वनस्पति विज्ञान विभाग से जुड़े हैं।
यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, लाइकेन को पर्यावरण के 'बायो-इंडिकेटर' माना जाता है। इनकी उपस्थिति और वृद्धि सीधे तौर पर हवा की शुद्धता और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता से जुड़ी होती है। मथिकेट्टन शोला में लाइकेन की इतनी अधिक विविधता यह दर्शाती है कि संरक्षित क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप कम होने से प्रकृति का पुनरुद्धार हो रहा है।
"लाइकेन आमतौर पर अबाधित वन पारिस्थितिकी तंत्र में पाए जाते हैं। चूंकि मथिकेट्टन शोला को एक संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है, इसलिए यहाँ लाइकेन की वृद्धि में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है।" - डॉ. स्टीफन सेक्वेरा
इस नई प्रजाति का नाम 'बुएलिया महाराजेंसिस' विशेष रूप से एर्नाकुलम के महाराजा कॉलेज के सम्मान में रखा गया है, जो अपनी 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह नाम संस्थान की दीर्घकालिक शैक्षणिक विरासत और जैव विविधता अनुसंधान में उसके निरंतर योगदान को श्रद्धांजलि देता है।
ऐतिहासिक संदर्भ में देखें तो, मथिकेट्टन शोला नेशनल पार्क का क्षेत्रफल 12.82 वर्ग किलोमीटर है। केरल सरकार ने 21 नवंबर, 2003 को आधिकारिक तौर पर इसे नेशनल पार्क घोषित किया था। तब से यह क्षेत्र पश्चिमी घाट के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
डॉ. सेक्वेरा ने बताया कि मथिकेट्टन शोला अब एक 'लाइकेन हब' के रूप में पहचाना जा रहा है। अश्वति अनिलकुमार के क्षेत्रीय शोध के दौरान यहाँ लगभग 250 लाइकेन प्रजातियों का दस्तावेजीकरण किया गया, जिनमें से 60 प्रजातियां केरल में और 15 प्रजातियां भारत में पहली बार दर्ज की गई हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. लाइकेन क्या होते हैं?
लाइकेन कवक और शैवाल का एक मिश्रण होते हैं जो चट्टानों, पेड़ों या मिट्टी पर उगते हैं और वायु प्रदूषण के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
2. Buellia maharajensis का नाम महाराजा कॉलेज के नाम पर क्यों रखा गया?
यह नाम कॉलेज की 150वीं वर्षगांठ और वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में उसके ऐतिहासिक योगदान के सम्मान में रखा गया है।