स्कूलों में स्मार्टफोन पर प्रतिबंध लगाने की वैश्विक लहर के बीच, विशेषज्ञों का तर्क है कि समस्या उपकरण नहीं बल्कि कंपनियों का डिजाइन है। असली समाधान फोन छीनने में नहीं, बल्कि एल्गोरिदम को विनियमित करने में है।

दुनिया भर में स्कूलों में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की एक तीव्र लहर देखी जा रही है। फ्रांस, ब्राजील, डेनमार्क और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने इस दिशा में कड़े कदम उठाए हैं। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के 58% देशों ने स्कूलों में मोबाइल फोन पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लागू कर दिया है। भारत में भी कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर नियंत्रण के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।

डिवाइस बनाम डिजाइन: असली समस्या क्या है?

वर्तमान बहस का मुख्य केंद्र बच्चों में बढ़ता तनाव, अवसाद, साइबर बुलिंग और एकाग्रता की कमी है। हालांकि ये चिंताएं जायज हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारें गलत लक्ष्य पर वार कर रही हैं। स्मार्टफोन केवल एक 'डिलीवरी वैन' की तरह है, जबकि असली समस्या वह 'फैक्ट्री' है जो इसके भीतर चलती है—यानी कि टेक कंपनियां।

Meta, ByteDance और Google जैसी दिग्गज कंपनियों ने अपने ऐप्स (जैसे Instagram, TikTok और YouTube) को इस तरह डिजाइन किया है कि उपयोगकर्ता लंबे समय तक ऑनलाइन रहे। 'इनफिनिट स्क्रॉलिंग', 'ऑटोप्ले' और 'एल्गोरिदम आधारित सुझाव' जैसे फीचर्स जानबूझकर बनाए गए हैं ताकि बच्चों का ध्यान खींचा जा सके और मुनाफा कमाया जा सके। स्कूल केवल फोन छीन सकते हैं, लेकिन वे उस व्यावसायिक मॉडल को नहीं छीन सकते जो बच्चों के ध्यान को लूटने के लिए बनाया गया है।

डिजिटल असमानता का खतरा

एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विकसित देशों के विपरीत, भारत जैसे विकासशील देशों में स्मार्टफोन केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। यह एक डिजिटल लाइब्रेरी और शिक्षा का द्वार भी है। DIKSHA, PM eVIDYA और SWAYAM जैसे सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से, दूरदराज के क्षेत्रों के छात्र इसी फोन के जरिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

यदि बिना सोचे-समझे पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाता है, तो इससे डिजिटल खाई और गहरी हो सकती है। जो छात्र सोशल मीडिया से विचलित हो रहा है और जो छात्र उसी फोन से अपना पाठ पढ़ रहा है, दोनों को एक ही श्रेणी में रखना अनुचित है।

निष्कर्ष: विनियमन ही एकमात्र रास्ता

बच्चों की सुरक्षा के लिए केवल फोन को क्लासरूम से बाहर निकालना पर्याप्त नहीं है। सरकारों को उन कंपनियों के डिजाइन और एल्गोरिदम को विनियमित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को जोखिम में डालती हैं। समाधान तकनीक को नकारने में नहीं, बल्कि तकनीक को सुरक्षित और जिम्मेदार बनाने में निहित है।