मद्रास हाई कोर्ट में दॉन पिक्चर्स ने कहा कि फिल्म निर्देशक सुधा कॉंगारा ने 'परासक्ती' के लिए 2D एंटरटेनमेंट से प्राप्त 4.12 करोड़ रुपये को छुपा दिया। इस खुलासे के बाद कोर्ट ने सुधा के इधरायम् मुराली की रिलीज़ रोकने के आवेदन को रोक दिया।

मद्रास हाई कोर्ट ने कल एक महत्वपूर्ण सुनवाई में दो प्रमुख फिल्म‑उत्पादन कंपनियों के बीच चल रहे कानूनी विवाद को उजागर किया। दॉन पिक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड ने अदालत को बताया कि निर्देशक सुधा कॉंगारा ने 2D एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड से ₹4.12 करोड़ की रक़म प्राप्त करने के बाद इसे कोर्ट में छुपा दिया, जबकि वही रक़म 'परासक्ती' फ़िल्म के लेखन, स्क्रिप्ट और संवाद के लिये दी गई थी।

विवाद की पृष्ठभूमि

कॉंगारा ने 2 जून 2021 को 2D एंटरटेनमेंट के साथ एक निर्देशक‑संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें उन्हें ₹12.5 करोड़ की पारिश्रमिक निर्धारित की गई थी। प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ा, इसलिए उन्होंने 2 दिसंबर 2024 को 2D के साथ एक नई समझौता‑समाप्ति पर हस्ताक्षर किया, जिसमें ₹4.12 करोड़ की अंतिम भुगतान के बदले वह सभी बौद्धिक संपदा अधिकार कंपनी को सौंपेंगी। उसी महीने दॉन पिक्चर्स ने 2D से अधिकार खरीदे और कॉंगारा को नई अनुबंध के तहत ₹15 करोड़ का भुगतान करने का वादा किया।

दॉन पिक्चर्स का दावा

दॉन पिक्चर्स ने कहा कि उन्होंने 2D एंटरटेनमेंट से फिल्म के बौद्धिक संपदा अधिकार ₹5.8 करोड़ में खरीदे और अब तक कॉंगारा को ₹8.5 करोड़ (जीएसटी छोड़कर) का भुगतान किया है, लेकिन उन्होंने समाप्ति‑समझौते की शर्तों को नहीं जाना। इस कारण वह कॉंगारा को अतिरिक्त भुगतान कर रहे थे, जबकि वह पहले ही सभी अधिकारों को 2D को सौंप चुकी थीं।

अन्य जटिलताएँ और नुक़सान

फिल्म के प्री‑प्रोडक्शन के दौरान नवंबर 2025 में एक लीक हुआ, जिससे दॉन पिक्चर्स को एंटी‑पायरेसी एजेंसियों को नियुक्त कर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से सामग्री हटवानी पड़ी। इस लीक ने ओटीटी बिक्री मूल्य को भी घटा दिया। इसके अलावा, एक स्वतंत्र पटकथा लेखक ने फिल्म की रिलीज़ से कुछ ही दिन पहले कॉपीराइट मुकदमा दायर किया, जिससे कंपनी को अतिरिक्त कानूनी खर्चे उठाने पड़े।

कोर्ट का निर्णय

जस्टिस के. कुमरेश बाबू ने सुधा कॉंगारा द्वारा इधरायम् मुराली (अथर्वा अभिनीत) की रिलीज़ रोकने के आवेदन पर आदेश को स्थगित किया। उन्होंने यह कहा कि सभी जुड़े हुए समझौतों की जाँच बिना किसी अंतरिम राहत के नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच वित्तीय और बौद्धिक अधिकारों का जटिल नेटवर्क है।

इस मामले से भारतीय फिल्म उद्योग में अनुबंधीय पारदर्शिता, बौद्धिक संपदा अधिकारों की स्पष्टता और लीक‑प्रबंधन की आवश्यकता पर नया प्रकाश पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऐसी विवादों को रोकने के लिये उत्पादन कंपनियों को व्यापक ड्यू‑डिलिजेंस और स्पष्ट समाप्ति‑शर्तें अपनानी चाहिए।