भारत में ई‑वेस्ट की बढ़ती समस्या को देखते हुए दिल्ली ने 2026 के ई‑वी नीति में बैटरियों की पुनर्चक्रण व्यवस्था को प्रमुखता दी है। यह कदम कचरे को मूल्यवान धातुओं में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दर्शाता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- दिल्ली के ई‑वी नीति 2026 में बैटरियों की संग्रह और पुनर्चक्रण को अनिवार्य किया गया।
- भारत में ई‑वेस्ट उत्पादन 2023‑24 में 1.75 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो विश्व में तीसरा स्थान रखता है।
- ई‑वेस्ट में सोना, सिल्वर, लिथियम जैसी कीमती धातुें हैं, जो सही प्रबंधन से संसाधन बन सकती हैं।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती मात्रा को लेकर सरकारें अब केवल रीसाइक्लिंग नहीं, बल्कि मूल्यवृद्धि की दिशा में सोच रही हैं। नई दिल्ली ने 2026 की ई‑वी नीति में विशेष रूप से बैटरियों के प्रबंधन को शामिल किया, जिससे ई‑वेस्ट को एक आर्थिक अवसर में बदला जा सके।
नीति की प्रमुख बातें
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) को ई‑वेस्ट के संग्रह, भंडारण, परिवहन और पुनर्चक्रण के मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOP) तैयार करने का कार्य सौंपा गया है। यह ढांचा 2022 के बैटरि वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के साथ तालमेल रखता है, जो उत्पादकों को उपयोग समाप्त बैटरियों को एकत्र करने और पुनर्चक्रण करने की जिम्मेदारी देता है।
भारत में ई‑वेस्ट का दायरा
2022 में वैश्विक स्तर पर 62 मिलियन टन ई‑वेस्ट उत्पन्न हुआ, जिसमें केवल 22.3% को औपचारिक रूप से पुनर्चक्रित किया गया। भारत ने FY24 में लगभग 3.8 मिलियन टन ई‑वेस्ट उत्पन्न किया, जो विश्व में तीसरा सबसे बड़ा जनरेटर बनता है। 2019‑20 में 1.01 मिलियन टन से बढ़कर 2023‑24 में 1.751 मिलियन टन तक वृद्धि ने इस चुनौती को स्पष्ट कर दिया है।
स्वास्थ्य और पर्यावरणीय जोखिम
ई‑वेस्ट में लेड, कैडमियम, क्रोमियम और ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट जैसी विषाक्त पदार्थ होते हैं। यदि खुले में जलाया या असुरक्षित विधियों से निपटा जाए तो ये मिट्टी, जल और वायु को प्रदूषित कर सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरा बनाते हैं।
संसाधन पुनः प्राप्ति की संभावनाएँ
सुनहरा तथ्य यह है कि ई‑वेस्ट में सोना, चांदी, तांबा, एल्यूमीनियम, लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसी धातुएँ निहित होती हैं। इनका कुशल पुनर्चक्रण न केवल पर्यावरणीय बोझ घटाता है, बल्कि कच्चे माल की खनन की आवश्यकता को भी कम करता है। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणविद अंजल प्रकाश ने कहा, “ई‑वेस्ट केवल निपटान की समस्या नहीं, बल्कि शासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और संसाधन पुनः प्राप्ति का अवसर है।”
भविष्य में क्या अपेक्षित है?
यदि दिल्ली की नीति सफल रहती है, तो यह अन्य राज्यों के लिए मॉडल बन सकती है। हालांकि, नियामक ढाँचे की कार्यान्वयन क्षमता, रीसाइक्लिंग संस्थानों की तकनीकी दक्षता और उपभोक्ता जागरूकता को साथ लेकर ही यह पहल सस्टेनेबल बन पाएगी।