मेट्टूर बांध से पानी न गिरने और लगातार सूखे के कारण त्रिची जिले के नेनड्रन केले के किसान जल अभाव से जूझ रहे हैं। अगले एक‑दो महीने में फसल बचाने की चुनौती उनके सामने है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • मेट्टूर बांध से जल रिहाई नहीं होने से नेनड्रन के खेतों में पानी की गंभीर कमी।
  • त्रिची जिले में लगभग 2,500 हेक्टेयर भूमि नेनड्रन केला उत्पादन में लगी हुई है।
  • किसानों को अब दो‑तीन हफ्तों में ग्राउंडवाटर घटने के कारण फसल बचाने में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।

त्रिची जिले के एंडनल्लुर, कुज़ुमानी, पेट्टवैथलै तथा आसपास के कई गांवों में नेनड्रन केला प्रमुख फसल बन चुका है। यह किस्म केरल में विशेष रूप से लोकप्रिय है और उच्च बाजार मूल्य प्राप्त करती है, जिससे स्थानीय किसानों को आर्थिक लाभ मिलता है।

नेनड्रन केला का महत्व और विस्तार

स्थानीय कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार, नेनड्रन केला त्रिची के कुल केले उत्पादन का लगभग एक‑तीसरा हिस्सा बनाता है। लगभग 2,500 हेक्टेयर भूमि पर इस फसल की खेती की जा रही है, और जनवरी‑फ़रवरी में पौधों की रोपाई पूरी हो चुकी है। कई किसान नदियों के किनारे, विशेषकर कोयिलर और कालीदम के पास, जहाँ भूजल स्तर अधिक स्थिर रहता है, वहाँ खेती करना पसंद करते हैं।

मेट्टूर बांध का जल अभाव

परम्परागत रूप से मेट्टूर बांध 12 जून को खोल दिया जाता है, जिससे नदियों के किनारे स्थित खेतों को सिंचाई का पानी मिलता है। इस वर्ष खराब जल भंडारण और निरंतर सूखे के कारण बांध अभी तक खोल नहीं पाया है। परिणामस्वरूप, कई किसान जिन्होंने जल की अपेक्षा की थी, अब भूजल के घटते स्तर से जूझ रहे हैं।

किसानों की चिंता और संभावित प्रभाव

उथमरसेली के किसान पी. मुरुगेसन ने कहा, “जो किसान कोयिलर के किनारे हैं, उनके पास अभी भी थोड़ा पानी है, पर बाकी को केवल दो‑तीन हफ्तों के लिये ही भूजल पर निर्भर रहना पड़ेगा। अगर स्थिति एक महीने और बनी रही, तो फसल पूरी तरह नष्ट हो सकती है।” नेनड्रन केला की फसल न केवल स्थानीय आय का स्रोत है, बल्कि केरल के बाजार में भी बड़ी मांग रखती है; इसकी विफलता से आर्थिक नुकसान कई लाखों रुपये तक पहुँच सकता है।

भविष्य की संभावनाएँ और समाधान

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि राज्य सरकार को तात्कालिक जल वितरण योजना बनानी चाहिए, जिसमें वैकल्पिक जल स्रोतों जैसे टैंकरॉड, जलभंडारण तालाब और जल पुनर्चक्रण प्रणाली को सक्रिय किया जाए। साथ ही, किसानों को जल‑संचयन तकनीकों व ड्रिप इरिगेशन अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिससे सीमित जल को अधिकतम उपयोग किया जा सके।