आसाम में लगातार बढ़ते मानसून के कारण बाढ़ ने 48,500 से अधिक लोगों को प्रभावित किया है। जल स्तर ने 179 गांवों को डुबो दिया, कृषि भूमि और बुनियादी ढाँचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, जबकि सरकार राहत कार्य तेज कर रही है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • आसाम में 48,500 से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित
  • 179 गांव डूबे, 2,117 हेक्टेयर कृषि भूमि क्षतिग्रस्त
  • सरकार ने राहत एवं पुनर्वास के लिए सभी संसाधन जुटाए

ब्रह्मपुत्र नदी की वार्षिक बाढ़ ने उत्तर‑पूर्वी भारत के कई जिलों को फिर से आपदा‑ग्रस्त कर दिया है। 1968 में भूपेन हज़ारिका द्वारा लिखी गई कविता “लुइत की पागल धारा” आज भी इस नदी की विनाशकारी शक्ति को बयां करती है। हर साल दक्षिण‑पश्चिमी मानसून की तीव्रता के साथ नदी का जल स्तर बढ़ता है, जिससे बाढ़, कटाव और भूमि हानि का चक्र चलता रहता है।

बाढ़ की वर्तमान स्थिति

आसाम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) की नवीनतम बुलेटिन के अनुसार, धेमाजी, डिब्रुगढ़, बिसवानाथ और नालबारी जिलों में 48,500 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। धेमाजी में 44,000 से अधिक निवासी बाढ़ के कारण विस्थापित हैं, जबकि डिब्रुगढ़ और बिसवानाथ में भी व्यापक क्षति दर्ज की गई है। कुल 179 गांव जलमग्न हुए हैं और 2,117 हेक्टेयर कृषि भूमि को पानी ने नष्ट कर दिया है, जिससे किसानों की आय पर सीधा प्रभाव पड़ा है।

आर्थिक और सामाजिक प्रभाव

बाढ़ ने न केवल घरों और फसलों को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि 82,000 से अधिक घरों के पशु‑पालन पर भी असर डाला है। ग्रामीण परिवार, जो अपनी आजी‑वजी के लिए मवेशी और मुर्गीपालन पर निर्भर थे, अब खाद्य सुरक्षा के संकट का सामना कर रहे हैं। सड़कों, पुलों और बाढ़ रोक बांधों की क्षति के कारण कई जिलों में आवागमन बाधित हो गया है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला और आपातकालीन सेवाओं पर असर पड़ा है।

सरकारी प्रतिक्रिया और चुनौतियाँ

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सारमा ने धेमाजी में राहत कार्य तेज करने का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार सभी उपलब्ध संसाधनों को त्वरित सुरक्षा और दीर्घकालिक पुनर्वास के लिए जुटा रही है। उत्तर‑पूर्वी फ़्रंटियर रेलवे ने बताया कि आर्चिपथर‑सिमेन चापारी के बीच एक रेलवे पुल के पायों में कटाव के कारण ट्रेन सेवाएँ निलंबित हैं, जिससे क्षेत्र की कनेक्टिविटी और भी जटिल हो गई है।

भविष्य की दिशा

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून की अनियमितता बढ़ेगी और बाढ़‑प्रवण क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचा मजबूत करना अनिवार्य होगा। जल निकासी प्रणाली, समय पर चेतावनी तंत्र और सामुदायिक स्तर पर विस्मरण‑प्रबंधन योजनाएँ इस संकट को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।