विजयवाड़ा राज्य सरकार ने गंभीर रोगियों को जीवन‑समर्थन हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट करने वाले नए दिशानिर्देशों को स्वीकृति दी। यह कदम सुप्रीम कोर्ट के 2018 के मौलिक अधिकार के फैसले को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
विजयवाड़ा में स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं परिवार कल्याण मंत्री सत्य कुमार यादव ने 8 जुलाई 2026 को टर्मिनल‑बिमार मरीजों के जीवन‑समर्थन हटाने के लिए विस्तृत दिशानिर्देशों को मंजूरी दी। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के 2018 के ऐतिहासिक निर्णय के बाद आया, जिसमें अदालत ने अनुच्छेद 21 के तहत ‘गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार’ को मौलिक अधिकार माना था।
पिछला कानूनी परिप्रेक्ष्य
2018 के फैसले के बाद 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘पैसिव यूथेनेशिया’ को नियमन करने हेतु संरचित मार्गदर्शन जारी किया। उन निर्देशों में डॉक्टरों, रोगी और उनके परिवार के अधिकारों के संतुलन को सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों की मेडिकल बोर्डों की स्थापना का प्रावधान था। हालांकि, राज्य‑स्तर पर स्पष्ट कार्यप्रणाली की कमी के कारण कई बार चिकित्सकों और देखभाल करने वालों में उलझन बनी रही।
नए दिशानिर्देशों की मुख्य बातें
नए नियमों के अनुसार, जब कोई रोगी टर्मिनल अवस्था में पहुँचता है तो डॉक्टर को सबसे पहले ऐडवांस मेडिकल डायरेक्टिव (AMD) की जाँच करनी होगी। AMD एक लिखित घोषणा है, जिसे रोगी स्वस्थ अवस्था में दो स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में नोटरी या गजेटेड अधिकारी के सामने साइन करता है, और स्थानीय प्राधिकरण को एक प्रति सौंपता है।
यदि AMD उपलब्ध नहीं है, तो रोगी के उपचार करने वाले अस्पताल को प्राथमिक मेडिकल बोर्ड (PMB) बनाना होगा, जिसमें रोगी के परिवार चिकित्सक और निकटतम रिश्तेदारों को शामिल किया जाएगा। PMB के प्रस्ताव को द्वितीयक मेडिकल बोर्ड (SMB) द्वारा समीक्षा किया जाएगा। दोनों बोर्डों की सहमति और रोगी के नामित प्रतिनिधि की लिखित स्वीकृति के बाद ही जीवन‑समर्थन का निरसन संभव होगा।
नियामकीय निगरानी और कार्यान्वयन
निर्देशों में चिकित्सा शिक्षा निदेशक अ. विष्णु वर्धन, द्वितीयक स्वास्थ्य निदेशक के.वी.एन. चक्रधर तथा जिला चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (DMHO) को इस प्रक्रिया की निगरानी करने का प्रावधान है। यह सुनिश्चित करेगा कि सभी चरण कानूनी रूप से सही हों और रोगी के अधिकारों की पूर्ण रक्षा हो।
समाज एवं स्वास्थ्य प्रणाली पर संभावित प्रभाव
इन दिशानिर्देशों के लागू होने से टर्मिनल रोगियों को अनावश्यक उपचारों से मुक्त कर, उनके जीवन की अंतिम अवधि को गरिमापूर्ण बनाना संभव होगा। साथ ही, डॉक्टरों को स्पष्ट कानूनी ढांचा मिलने से भय और अनिश्चितता कम होगी, जिससे पेलियेटिव केयर में सुधार की उम्मीद है। यह कदम भारत में ‘अधिकार‑आधारित स्वास्थ्य नीति’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।