एक नवीन अध्ययन ने बताया कि निर्णय लेने की सीमित स्वतंत्रता, अर्थात् नियंत्रण, स्वायत्तता और लचीलापन की कड़ी कमी, असम के चाय बाग़ कार्यकारियों में तनाव का सबसे बड़ा कारण है। यह तनाव उनके मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
असम के चाय बाग़ों में कार्यकारियों की भूमिका अत्यंत जटिल है; उन्हें उत्पादन, प्रशासनिक कार्य और मानव संसाधन प्रबंधन का संतुलन बनाना पड़ता है। ब्रिटिश उद्यमियों ने दो शताब्दी पहले इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर चाय उत्पादन शुरू किया और साथ ही कार्यकारियों को लक्ज़री बंगले, क्लब, गोल्फ कोर्स जैसी सुविधाएँ प्रदान कीं। स्वतंत्रता के बाद इन सुविधाओं में क्रमिक गिरावट आई, जिससे आज कार्यकारियों के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
इतिहास और परिवर्तन
ब्रिटिश काल में चाय बाग़ों को ‘परिवार’ की तरह देखा जाता था; कार्यकारियों को सामाजिक और मनोरंजक सुविधाएँ दी जाती थीं ताकि दूरस्थ क्षेत्रों में उनका मनोबल बना रहे। 1947 के बाद उद्योग का निजीकरण, सरकारी नीतियों में बदलाव और कराधान ने इन सुविधाओं को घटा दिया। साथ ही, उग्रवादी हमले, वैश्विक बाजार की मंदी और जलवायु परिवर्तन ने बाग़ों की आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित किया। इस सबका प्रत्यक्ष असर कार्यकारियों के तनाव स्तर पर पड़ा है।
अध्ययन की मुख्य खोजें
डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय के प्रबंधन अध्ययन केंद्र के सहायक प्रोफ़ेसर प्रसून राज कौशिक द्वारा किए गए इस शोध में पाँच प्रमुख तनाव‑कारकों की पहचान की गई: व्यक्ति‑पर्यावरण अनुकूलन, शारीरिक जोखिम, पुनरावृत्त गैर‑परस्परता, सीमित निर्णय‑स्वतंत्रता और लेन‑देन‑संकट। इनमें सीमित निर्णय‑स्वतंत्रता को सबसे बड़ा तनाव‑स्रोत माना गया। यह तब उत्पन्न होता है जब कार्यकारियों को अपने कार्य‑प्रवाह, समय‑सारणी और कर्मचारियों के प्रबंधन में पर्याप्त अधिकार नहीं मिलता।
परिणामस्वरूप तनाव के प्रमुख कारक
सुविधाओं की कमी सीधे सीमित निर्णय‑स्वतंत्रता से जुड़ी है। अध्ययन ने पाया कि असम‑आधारित कार्यकारियों और अन्य राज्यों के कार्यकारियों के बीच तनाव स्तर में अंतर है, हालाँकि यह अंतर अत्यधिक नहीं माना गया। मध्यम और निचले स्तर के कार्यकारियों में तनाव का स्तर सबसे अधिक था, जो दर्शाता है कि प्रबंधन की निचली पायदान पर दबाव अधिक है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
चाय उद्योग असम की अर्थव्यवस्था का मुख्य स्तंभ है; कार्यकारियों के मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट उत्पादकता, गुणवत्ता और निर्यात क्षमता को सीधे प्रभावित करती है। तनाव‑प्रबंधन कार्यक्रमों की कमी न केवल व्यक्तिगत कल्याण को खतरे में डालती है, बल्कि पूरे उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को भी कमजोर करती है।
भविष्य की दिशा
नेशनल ईस्टर्न टी एसोसिएशन (NETA) के सलाहकार बिद्यानंद बर्ककोटी ने कहा कि यह शोध “कार्यस्थल तनाव” के अनदेखे पहलू को उजागर करता है और नीतिनिर्माताओं को कर्मचारी‑कल्याण को प्राथमिकता देने का संकेत देता है। कंपनियों को तनाव‑प्रबंधन पहल, लचीले कार्य‑समय, निर्णय‑स्वतंत्रता बढ़ाने वाले प्रोटोकॉल और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन सेवाएँ स्थापित करनी चाहिए। ऐसी पहल न केवल तनाव को कम करेगी, बल्कि कार्यकारियों की प्रेरणा और बाग़ों की आर्थिक स्थिरता को भी सुदृढ़ करेगी।