स्वतंत्रता के बाद पोटी श्रीरामुलु ने तेलुगु‑भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की माँग में 58 दिनों का उपवास किया। उनकी मृत्यु ने नेहरू सरकार को अंध्र प्रदेश राज्य की घोषणा करने पर मजबूर किया, जिससे भारत का प्रथम भाषाई राज्य बना।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- पोटी श्रीरामुलु का 58‑दिन का उपवास भारत में प्रथम भाषाई राज्य‑निर्माण की राह खोल गया।
- नेहरू का प्रारम्भिक विरोध बाद में जनसमुदाय के बड़े आंदोलन से बदल गया।
- आधुनिक समय में सोनम वांगचुक का उपवास इतिहास के समान सामाजिक परिवर्तन की मांग को दर्शाता है।
स्वतंत्रता के पाँच वर्ष बाद, पोटी श्रीरामुलु ने तेलुगु‑भाषी लोगों के लिये अलग राज्य की माँग में अक्टूबर 1952 में उपवास‑मरन का वचन दिया। यह उपवास मात्र व्यक्तिगत तप नहीं, बल्कि गांधीवादी सच्चाग्राह के एक गंभीर प्रयोग था, जो भारतीय राजनीति के नक्शे को बदलने वाला सिद्ध हुआ।
इतिहासिक पृष्ठभूमि
स्वतंत्रता के बाद भारत में अधिकांश प्रांत मौजूदा औपनिवेशिक प्रशासनिक सीमाओं पर ही बने थे। मद्रास प्रेसीडेंसी में तेलुगु‑भाषी क्षेत्रों को तमिल‑भाषी प्रशासनिक ढाँचे में रखा गया था, जिससे स्थानीय लोगों में असंतोष उत्पन्न हुआ। 1950 के दशक में कई भाषायी आंदोलनों ने इस असंतोष को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया, परन्तु नेहरू की सरकार भाषा‑आधारित विभाजन को राष्ट्रीय एकता के खतरे के रूप में देखती थी।
श्रीरामुलु की तेज़ी और उसकी मृत्यु
श्रीरामुलु ने पहले 29‑दिन का उपवास किया था, जिसे महात्मा गांधी ने सराहा था। 1952 में उन्होंने फिर से 58‑दिन का उपवास शुरू किया। उपवास के चौथे दिन ही उनका निधन हो गया, परन्तु उनकी मृत्यु ने अंध्र प्रदेश आंदोलन को नई ऊर्जा प्रदान की। तमिल‑भाषी क्षेत्रों में हिंसा, प्रदर्शनों और पुलिस फायरिंग ने राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को तात्कालिक बना दिया।
नेहरू की नीति में बदलाव
जवाहरलाल नेहरू ने प्रारम्भ में भाषाई राज्यों की स्थापना को “गलत समय” कहा था। परन्तु जनआंदोलन की तीव्रता और श्रीरामुलु की शहादत ने उन्हें मजबूर किया। 15 अगस्त 1953 को भारत की पहली भाषा‑आधारित राज्य, अंध्र प्रदेश, का गठन घोषित किया गया। यह निर्णय भारत के बाद के कई भाषाई पुनर्गठन का आधार बना।
समकालीन समानता: सोनम वांगचुक का उपवास
आज के समय में लद्दाख के शैक्षिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने नेशनल एग्ज़ाम (NEET‑UG) पेपर लीक के विरोध में जंतर मंतर में 20‑वें दिन तक उपवास जारी रखा है। दोनों केसों में “हिंसा‑रहित दबाव” के माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाना प्रमुख लक्ष्य है, परन्तु परिस्थितियों में अंतर स्पष्ट है: एक ने राष्ट्र की सीमाओं को पुनः परिभाषित किया, जबकि दूसरा मौजूदा नीति में सुधार की मांग करता है।
श्रीरामुलु की कहानी यह सिद्ध करती है कि व्यक्तिगत त्याग राष्ट्रीय परिवर्तन को प्रेरित कर सकता है, और यह सिद्धांत आज के सामाजिक आंदोलन में भी जीवित है।