भारत और संयुक्त राज्य के बीच रक्षा‑प्रौद्योगिकी सहयोग के कई बड़े वादे अब तक औद्योगिक रूप से ठोस परिणाम नहीं दे पाए हैं। दो दशकों में 22 अरब डॉलर के उपकरण खरीदे गए हैं, पर वास्तविक सह‑उत्पादन और तकनीक‑स्थानांतरण अभी भी दूर है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत‑अमेरिका ने 2002‑से $22 अरब रक्षा उपकरण खरीदे, पर सह‑उत्पादन कम है।
- GE का F414 इंजन प्रोजेक्ट लागत‑वृद्धि और तकनीक‑स्थानांतरण विवादों से जूझ रहा है।
- iCET, INDUS‑X जैसे पहलें राजनीतिक शोर बनाकर रह गईं, वास्तविक सहयोग नहीं दे पाईं।
भारत‑अमेरिका रक्षा सहयोग ने रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में बड़े‑बड़े घोषणा‑केन्द्रित छवि बना ली है, पर इन घोषणाओं को औद्योगिक परिणामों में बदलना अभी भी एक चुनौती बनी हुई है। 2002 के बाद से नई दिल्ली ने एपीचे, चिनूक हेलीकॉप्टर, C‑17, C‑130J, P‑8I और M777 जैसे उपकरणों के लिए लगभग $22 अरब खर्च किए हैं, जबकि संयुक्त राज्य प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ता बना है। फिर भी, वास्तविक सह‑उत्पादन और तकनीक‑स्थानांतरण अभी तक नहीं हो पाया है।
GE F414 इंजन का मामला
जेनरल इलेक्ट्रिक का F414 फाइटर इंजन, जो पहले द्विपक्षीय रक्षा सहयोग का प्रतीक माना जाता था, अब लागत‑वृद्धि और तकनीकी विवादों का केंद्र बन गया है। प्रारम्भिक अनुमान के अनुसार प्रत्येक इंजन की कीमत ₹70‑80 करोड़ थी, पर अब यह ₹200 करोड़ से ऊपर पहुँच गई है। GE ने भारत से लगभग $800 मिलियन (₹7,576 करोड़) की निवेश मांग की है, ताकि एक समर्पित उत्पादन लाइन स्थापित की जा सके।
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) इस इंजन को तेज़स Mk‑II के लिए लाइसेंस‑आधारित उत्पादन के तहत खरीदा रहा है, जबकि DRDO और एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) इसे AMCA और भारतीय नौसेना के ट्विन‑इंजन डेक‑बेस्ड फाइटर के लिए अलग‑अलग चाहते हैं। इस जटिलता ने कई स्तरों पर बातचीत को जटिल बना दिया है, जिससे परियोजना अभी भी अनिश्चित है।
आकांक्षा बनाम वास्तविकता
2012 में शुरू हुआ Defence Technology and Trade Initiative (DTTI) ने कई बैठकों के बाद भी कोई उल्लेखनीय सैन्य क्षमता नहीं दी। इसके उत्तराधिकारी iCET (2022) ने सेमी‑कंडक्टर, AI, क्वांटम, स्पेस, बायोटेक, ड्रोन और आपूर्ति श्रृंखला जैसी व्यापक तकनीकों को शामिल किया, पर F414 जैसी प्रमुख परियोजना ही इस असफलता का प्रतीक बनी है।
2023 में लॉन्च किया गया India‑United States Defence Acceleration Ecosystem (INDUS‑X) ने स्टार्ट‑अप, अकादमी और उद्योग को जोड़ने की आशा जताई, पर अभी तक कोई उल्लेखनीय सह‑विकास परिणाम नहीं दिखा। जावेलिन एंटी‑टैंक मिसाइल और जनरल डायनेमिक्स स्ट्राइकर इन्फैंट्री वाहन जैसी सहयोगी परियोजनाएँ भी एक दशक से अधिक समय से ठहराव में हैं।
भविष्य की राह
2024 में MQ‑9B स्कायगार्डियन ड्रोन की $3.5 अरब की खरीद भी मूल रूप से एक खरीदारी रही, जबकि स्थानीय असेंबली और भागीदार निर्माण के वादे अभी तक साकार नहीं हुए। ये सभी उदाहरण दर्शाते हैं कि भारत‑अमेरिका की रक्षा पहलों को अक्सर “ऐतिहासिक”, “परिवर्तनकारी” या “गेम‑चेंजर” कहा जाता है, पर वास्तविक कार्यान्वयन में लगातार अंतर रहता है।
मुख्य कारण दो देशों के रक्षा क्षेत्र की बुनियादी दार्शनिक भिन्नता है। भारत उन्नत तकनीक को अपने उद्योग में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के साधन के रूप में देखता है, जबकि अमेरिका इन तकनीकों को रणनीतिक संपत्ति मानता है और कड़ी निर्यात‑नियंत्रण नीतियों के तहत रखता है। इस अंतर को पाटे बिना कोई दीर्घकालिक सहयोग संभव नहीं है।