कैपजेमिनी कैंपस में बच्चों के दुरुपयोग के आरोपों के बाद कर्नाटक सरकार डेकेयर केंद्रों को कड़े नियमों के तहत लाने और एक नोडल एजेंसी द्वारा निगरानी सुनिश्चित करने की योजना बना रही है। 2015 के मौजूदा दिशा‑निर्देशों को सभी हितधारकों की राय से पुनः संशोधित किया जाएगा।

कर्नाटक सरकार ने हाल ही में कैपजेमिनी के कैंपस में स्थित एक डेकेयर सेंटर में बच्चों के alleged दुरुपयोग की घटना के बाद, राज्य‑स्तर पर डेकेयर केंद्रों के नियमन एवं निगरानी के लिए एक नोडल एजेंसी नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा है। यह कदम न केवल अभिभावकों के विश्वास को बहाल करने के लिये, बल्कि बच्चों की सुरक्षा के लिये एक ठोस ढांचा स्थापित करने के लिये आवश्यक माना गया है।

2015 के दिशा‑निर्देशों में खाई

कर्नाटक में डेकेयर केंद्रों के लिये 2015 में एक व्यापक नियमावली तैयार की गई थी, जिसमें ‘नियमित एवं आकस्मिक निरीक्षण’ और निरीक्षण के बाद सुधार हेतु सिफ़ारिशें देने का प्रावधान था। हालांकि, उन दिशा‑निर्देशों में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि निरीक्षण के लिये कौन‑सी विभाग या प्राधिकरण जिम्मेदार होगा, जिससे कई मामलों में निगरानी का अभाव बना रहा।

नोडल एजेंसी के लिये गठित समिति

कर्नाटक राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (KSCPCR) के चेयरपर्सन संतोश कुमार ने बताया कि आयोग सभी संबंधित विभागों, अभिभावकों और विशेषज्ञों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक समिति का गठन करेगा। इस समिति का मुख्य कार्य 2015 के दिशा‑निर्देशों को पुनः समीक्षा करना, हितधारकों की सिफ़ारिशें एकत्रित करना और नोडल एजेंसी के चयन के लिये मानदंड तय करना होगा।

नए दिशा‑निर्देशों में प्रमुख परिवर्तन

नए संशोधित नियमावली में कई महत्वपूर्ण बिंदु शामिल किए जाएंगे, जैसे कि प्रत्येक डेकेयर में अधिकतम बच्चे की संख्या, योग्य देखभाल कर्मचारियों की न्यूनतम संख्या, और सरकारी पोर्टल के माध्यम से अनिवार्य पंजीकरण। साथ ही, सभी केंद्रों में सीसीटीवी कैमरा स्थापित करना अनिवार्य किया जाएगा, जिससे अभिभावकों, देखभालकर्ताओं और नियामक एजेंसियों को रियल‑टाइम निगरानी का अधिकार मिलेगा।

भविष्य के प्रभाव और चुनौतियां

यदि नोडल एजेंसी को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित किया गया, तो यह कर्नाटक में बाल सुरक्षा के मानकों को राष्ट्रीय स्तर पर एक उदाहरण बना सकता है। हालांकि, इस योजना को सफल बनाने के लिये वित्तीय संसाधन, तकनीकी समर्थन और स्थानीय प्रशासनिक सहयोग की आवश्यकता होगी। साथ ही, छोटे‑छोटे अनौपचारिक डेकेयर संस्थानों को नई नियमावली के अनुकूल बनाना एक चुनौती बन सकता है, जिसके लिये राज्य को सूक्ष्म समर्थन तंत्र विकसित करना पड़ेगा।

समग्र रूप से, यह पहल कर्नाटक को बाल अधिकार संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी बनाते हुए, भविष्य में समान समस्याओं को रोकने के लिये एक ठोस मॉडल पेश कर सकती है।