राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने शबीर अहमद शाह और पाँच अन्य हुर्रियत कॉन्फ़्रेंस के वरिष्ठ सदस्यों के खिलाफ 1996 के स्रीनगर दंगों में आपराधिक साज़िश, हत्या का प्रयास और दहशत के आरोपों में चार्जशीट फाइल की। यह मामला जम्मू‑कश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य में सुरक्षा और अलगाववादी रणनीति के पुनरावलोकन को प्रेरित कर सकता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • NIA ने शबीर शाह और पाँच सह‑आरोपीयों पर 1996 के दंगों में आपराधिक साज़िश सहित कई गंभीर आरोप लगाए।
  • जम्मू‑कश्मीर पुलिस से जांच को अप्रैल में NIA को सौंपा गया, जिससे केस का दायरा राष्ट्रीय सुरक्षा तक विस्तृत हुआ।
  • हुर्रियत के प्रमुख नेता सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन, मोहम्मद याकूब वैकेल आदि की मृत्यु के कारण मुकदमा अब रुक गया।

जम्मू‑कश्मीर के राजधानी स्रीनगर में 17 जुलाई 1996 को हुए एक मिलिटेंट की अंत्यसंस्कार पर हुई हिंसा के संदर्भ में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने शबीर अहमद शाह, सैयद अली शाह गिलानी, अब्दुल गनी लोन, मोहम्मद याकूब वैकेल, जाविद अहमद मीर और शकील अहमद बख्शी के खिलाफ विस्तृत चार्जशीट दायर की। इस चार्जशीट में आपराधिक साज़िश, हत्या का प्रयास, दंगा, सार्वजनिक सेवकों पर हमला और 1967 के आतंकवाद विरोधी अनलॉफ़ुल एक्ट के तहत कई धारा शामिल हैं।

पृष्ठभूमि एवं घटनाक्रम

1996 के इस दंगे की जड़ें तब तक पहुँचती हैं जब हिलाल अहमद बेइघ, एक मिलिटेंट, की मृत्यु के बाद उसके अंत्यसंस्कार का जुलूस स्रीनगर के नाज़ क्रॉसिंग से गुजर रहा था। NIA के अनुसार, इस जुलूस में सशस्त्र मिलिटेंटों ने पुलिस पर गोलीबारी की, कई पुलिसकर्मियों को चोटें आईं और सरकारी वाहनों को पत्थर फेंके गए। साथ ही, भीड़ ने भारत-विरोधी, पाकिस्तान-समर्थक और अलगाववादी नारे लगाए, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था बिखर गई।

जांच का राष्ट्रीयकरण

जम्मू‑कश्मीर पुलिस द्वारा प्रारम्भिक जांच के बाद, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अप्रैल 2026 में इस मामले को NIA को सौंपा। यह कदम सुरक्षा एजेंसियों के बीच सहयोग को सुदृढ़ करने और संभावित राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिमों को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया था। इस हस्तांतरण के बाद, NIA ने विस्तृत साक्ष्य एकत्र कर चार्जशीट तैयार की, जिसमें दंगों को हुर्रियत नेतृत्व की एक बड़े पैमाने पर अलगाववादी साजिश का हिस्सा बताया गया है।

वर्तमान कानूनी स्थिति

जम्मू के एक कोर्ट ने पिछले सप्ताह शबीर शाह की जमानत की याचिका को खारिज कर दिया, जिससे उनकी हिरासत जारी रही। गिलानी, लोन और वैकेल की मृत्यु के कारण उनके खिलाफ चल रहे मुकदमों को स्थगित कर दिया गया, लेकिन शबीर शाह, जाविद अहमद मीर और शकील अहमद बख्शी के खिलाफ प्रक्रिया जारी है।

भविष्य की संभावनाएँ

यह मामला न केवल जम्मू‑कश्मीर में सुरक्षा ढांचे को चुनौती देता है, बल्कि हुर्रियत जैसी राजनीतिक संगठनों की वैधता और उनके कार्यों की सीमा को भी प्रश्नवाचक बनाता है। यदि अदालत इस चार्जशीट को स्वीकार करती है, तो यह क्षेत्र में अलगाववादी आंदोलन को दबाने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल स्थापित कर सकता है। साथ ही, यह भारत के भीतर आतंकवाद विरोधी कानूनों के लागू करने के तरीके पर भी गहन चर्चा को जन्म देगा।