आंकड़ों की नवीनतम रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में आधे से भी कम गाँवों में ‘गिरडावरी’ समय पर पूरा हुआ है, जबकि 20‑वर्ष पुरानी नक्शे और प्रशिक्षित न रहने वाले कर्मी खाद्य‑सुरक्षा को जोखिम में डाल रहे हैं। इस डेटा‑खामियों से राष्ट्रीय नीति‑निर्माताओं को सटीक उत्पादन‑आकलन में बाधा मिल रही है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- गिरडावरी सर्वेक्षण केवल 43% गाँवों में समय पर पूरा हुआ।
- 63% गांव नक्शे 20 साल से पुराने, जिससे भूमि‑परोपकार में त्रुटियां बढ़ी।
- कई प्रमुख राज्यों में फसल‑कटिंग प्रयोग अपर्याप्त प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा किए जा रहे हैं।
नई दिल्ली – मानसून की कमी और खरीफ़ की बुवाई में अनिश्चितता के बीच, भारत के सांख्यिकी मंत्रालय ने कृषि आँकड़ों में गंभीर अंतराल उजागर किया है। यह रिपोर्ट, जिसका शीर्षक *Crop Statistics System Review* है, दिखाती है कि मूलभूत आँकड़े – ‘गिरडावरी’ – केवल आधे से कम गाँवों में निर्धारित समय सीमा के भीतर पूर्ण हुए। यह अंतराल राष्ट्रीय खाद्य‑सुरक्षा रणनीतियों को सीधे प्रभावित करता है, क्योंकि यह आँकड़े Commission for Agriculture Costs and Prices (CACP) द्वारा लागत‑आधारित मूल्यांकन और अग्रिम उत्पादन‑आकलन के लिए उपयोग किए जाते हैं।
पृष्ठभूमि और मौजूदा स्थिति
‘गिरडावरी’ भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि अधिकारी द्वारा आयोजित आधिकारिक फसल‑गिनती का सबसे बुनियादी चरण है। 2023‑24 में, रिपोर्ट ने बताया कि आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में इस प्रक्रिया का न‑समापन ‘अत्यधिक उच्च’ था। परिणामस्वरूप, शुरुआती खरीफ़ के दौरान केवल 43% नमूना गाँवों में, देर‑खरीफ़ में 46%, रबी में 48% और ग्रीष्मकाल में 33% गाँवों में ही आँकड़े उपलब्ध हुए।
पुरानी भूमि‑नक्शे और उनका प्रभाव
रिपोर्ट के अनुसार, 63% गाँवों के नक्शे दो दशकों से पुराने हैं। पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी में सभी गाँवों के नक्शे 20 साल से अधिक पुराने हैं, जबकि ओडिशा (99%), उत्तराखंड (98%) और असम (94%) में भी यही स्थिति है। यह पुरानी मानचित्रण शहरीकरण, नई सड़कें और औद्योगिक विकास के कारण भूमि‑सीमाओं में हुए बदलावों को प्रतिबिंबित नहीं कर पाते, जिससे सर्वेक्षण संख्या की पहचान में त्रुटियां उत्पन्न होती हैं।
अप्रशिक्षित कर्मियों द्वारा फसल‑कटिंग प्रयोग
फसल‑कटिंग प्रयोग (CCE) औसत उपज और अंतिम खाद्य उत्पादन के अनुमान में वैज्ञानिक आधार बनाते हैं। लेकिन रिपोर्ट में बताया गया है कि झारखंड और उत्तर प्रदेश में 40% CCE अप्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा किए गए, जबकि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में 10% से अधिक प्रयोग जूनियर स्टाफ द्वारा किए गए। कुल मिलाकर 2023‑24 में लगभग 12 लाख CCE किए गए, जिनमें से बड़ी संख्या की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं।
भविष्य के प्रभाव और नीति‑निर्णय
इन अंतरालों के कारण, सरकार को निर्यात प्रतिबंध, आयात शुल्क समायोजन या आपातकालीन भंडार रिलीज़ जैसे त्वरित निर्णय लेने में असामान्य जोखिम का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राज्य‑स्तर पर समय पर ‘गिरडावरी’ और अपडेटेड नक्शे नहीं किए गए, तो अगली फसल‑संकट में कीमतों में अचानक उछाल और महंगाई की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए, तत्काल सुधारात्मक कदम, जैसे डिजिटल भू‑सूचना प्रणाली का कार्यान्वयन और प्रशिक्षित फील्ड कर्मियों की भर्ती, अनिवार्य हो गया है।