बीजेपी राज्य अध्यक्ष एन. रमनचंदर राव ने कांग्रेस सरकार पर कलेश्वरम लिफ्ट इरिगेशन प्रोजेक्ट के तीन बैरिजों के पुनर्वास में देरी का आरोप लगाया, जिससे राज्य के कृषि और पीने के पानी पर असर पड़ रहा है। उन्होंने यह आरोप मुख्य मंत्री ए. रेवंत रेड्डी को लिखे खुले पत्र में रखा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कलेश्वरम बैरिजों का पुनर्वास देर से हो रहा है
- जल आपूर्ति और सिंचाई पर गंभीर प्रभाव
- बीजेपी‑कांग्रेस के बीच राजनीतिक टकराव तेज़
तेलंगाना BJP राज्य अध्यक्ष एन. रमनचंदर राव ने 12 जुलाई को खुले पत्र में कांग्रेस‑नेतृत्व वाली सरकार पर कलेश्वरम लिफ्ट इरिगेशन प्रोजेक्ट (KLIP) के तीन बैरिजों के पुनर्वास को टालने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस देरी से न केवल कृषि क्षेत्र बल्कि ग्रामीण पानी की आपूर्ति भी बाधित हो रही है।
परियोजना का ऐतिहासिक महत्व
कलेश्वरम बैरिज, गोदावरी नदी पर स्थित, भारत के सबसे बड़े लिफ्ट इरिगेशन सिस्टम का हिस्सा हैं। 2019 में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट राज्य के जल‑सुरक्षा को सुदृढ़ करने और 1.5 मिलियन हेक्टेयर से अधिक खेती योग्य भूमि को सिंचित करने के उद्देश्य से बनाया गया था। प्रारंभिक चरण में कई तकनीकी चुनौतियां सामने आईं, लेकिन राष्ट्रीय डैम सुरक्षा प्राधिकरण (NDSA) ने 2025 में विस्तृत पुनर्वास सिफारिशें जारी कीं।
राजनीतिक दांव‑पेंच
राव ने पिछले बीआरएस (बजु राजन) शासन को भी बैरिजों के क्षति के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए वर्तमान कांग्रेस सरकार को “छोटी‑छोटी राजनीति” के हवाले से कार्यवाही में देरी का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि NDSA की सिफारिशें एक‑दो कार्यकाल में पूरी की जा सकती थीं, परंतु सरकार ने “जाल” बुनते हुए जिम्मेदारी को केंद्र सरकार की ओर मोड़ दिया।
तकनीकी विश्लेषण और विशेषज्ञ राय
स्वतंत्र जल विशेषज्ञों ने कहा है कि कन्नेपाली पम्पहाउस से जल उठाने की प्रक्रिया मेडिगड्डा बैरिज पर अतिरिक्त दबाव नहीं डालती, क्योंकि पानी को सीधे नदी के प्रवाह से खींचा जाता है। फिर भी, बैरिजों की संरचनात्मक क्षति को ठीक करना आवश्यक है, नहीं तो भविष्य में जल‑संकट और कृषि उत्पादन में गिरावट आ सकती है।
भविष्य की दिशा और संभावित परिणाम
यदि पुनर्वास कार्य में और विलंब होता रहा, तो तेलंगाना की जल‑सुरक्षा योजना को गंभीर नुकसान हो सकता है, जिससे राज्य के फसल उत्पादन और ग्रामीण जल उपलब्धता दोनों पर असर पड़ेगा। विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाकर इस्तेमाल करने से तकनीकी समाधान की गति धीमी पड़ सकती है, जबकि केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की नई समिति के कार्यान्वयन में भी देरी का जोखिम बना रहेगा।