बेलगावि के आरटीआई कार्यकर्ता भीमप्पा गडाड ने राज्य गवर्नर को सूचना आयोग की कमजोरियों को दूर करने और आरोपित अधिकारियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा, यदि कोई कार्रवाई नहीं हुई तो कानूनी कदम उठाने का विकल्प अपनाना पड़ेगा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- आरटीआई कार्यकर्ता ने राज्य गवर्नर को सूचना आयोग की कार्यवाही में सुधार के लिए लिखित शिकायत की।
- सूचना आयुक्तों पर आरोप है कि उन्होंने आरटीआई अधिनियम का उल्लंघन किया और कई आवेदन अस्वीकार किए।
- यदि त्वरित जांच नहीं हुई तो कार्यकर्ता कानूनी कार्रवाई करेंगे।
बेलगावि स्थित आरटीआई कार्यकर्ता भीमप्पा गडाड ने राज्य गवर्नर को एक औपचारिक शिकायत भेजी है, जिसमें उन्होंने कहा कि कर्नाटक सूचना आयोग की कार्यवाही अधिनियम के मूल उद्देश्यों को कमजोर कर रही है। यह शिकायत कई नागरिक अधिकार समूहों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से तैयार की गई है, जो पिछले कुछ महीनों से आयोग के अनुचित कार्यों को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे थे।
पृष्ठभूमि और कानूनी ढांचा
भारत का सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 पारदर्शिता और उत्तरदायित्व को बढ़ावा देने के लिये बनाया गया था, जिससे नागरिक सरकारी दस्तावेज़ों तक आसान पहुँच प्राप्त कर सकें। इस अधिनियम के कार्यान्वयन की देखरेख राज्य सूचना आयोग (SIC) द्वारा की जाती है, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सूचना आयुक्त (CIC) और अन्य आयुक्तों द्वारा होती है। सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में एक दिशा-निर्देश जारी किया था, जिसमें आयोग के नियुक्तियों के लिये एक स्वतंत्र खोज समिति की स्थापना अनिवार्य की गई थी।
आरोप और मौजूदा स्थिति
गडाड ने कहा कि राज्य सरकार ने इस सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का उल्लंघन किया है, क्योंकि मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही। इसके अलावा, आयुक्तों ने 25 से अधिक आरटीआई आवेदन करने वाले कार्यकर्ताओं को ब्लैकलिस्ट करने की धमकी दी है, जो किसी भी वैध कानूनी आधार पर नहीं है। कई मामलों में, आयुक्तों ने औपचारिक कारणों के बिना आवेदन को अस्वीकार किया, जिससे नागरिकों का अधिकार छीन लिया गया।
गवर्नर की भूमिका और संभावित परिणाम
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के तहत, राज्य गवर्नर को राज्य के संवैधानिक और प्रशासनिक संस्थानों की रक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई है। गडाड का तर्क है कि गवर्नर को इस मुद्दे में सक्रिय भूमिका निभाते हुए, सूचना आयुक्तों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करनी चाहिए। यदि तुरंत जांच नहीं हुई, तो कार्यकर्ता न्यायालय में पिटिशन दायर करने की संभावना बना रहेगी, जिससे राज्य सरकार पर कानूनी दबाव बढ़ेगा।
भविष्य की दिशा
यदि गवर्नर इस शिकायत को गंभीरता से लेते हैं और आयोग के भीतर सुधारात्मक कदम उठाते हैं, तो यह कर्नाटक में आरटीआई के प्रभाव को पुनर्स्थापित कर सकता है, जिससे सार्वजनिक विश्वास बढ़ेगा। दूसरी ओर, यदि कोई कार्रवाई नहीं होती, तो यह अन्य राज्य सूचना आयोगों में भी समान समस्याओं को उत्पन्न कर सकता है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर पारदर्शिता के सिद्धांत कमजोर पड़ेंगे।