कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवाकुमार ने बताया कि बिदाड़ी टाउनशिप परियोजना के लिए ज़मीन जबरन नहीं ली जाएगी और इसके पुनरावलोकन के लिए एक समिति गठित की जाएगी। उन्होंने विरोध को राजनीतिक षड्यंत्र बताया और किसानों को आश्वस्त किया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कर्नाटक सरकार ने बिदाड़ी टाउनशिप के लिए ज़बरदस्ती ज़मीन अधिग्रहण नहीं किया जाएगा.
  • सीएम डीके शिवाकुमार ने परियोजना की समीक्षा के लिए समिति का गठन किया.
  • प्रदर्शन को राजनीतिक षड्यंत्र माना गया, जबकि पहले के पीएम एच.डी. देवेगौड़ा ने विरोध किया.

बेंगलुरु, 15 जुलाई 2026 – कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवाकुमार ने आज विधान सभा के बाहर आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार किसी भी तरह से किसानों को बिदाड़ी टाउनशिप (ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप) के लिए ज़बरदस्ती ज़मीन नहीं लेगी। उन्होंने बताया कि अगले कुछ दिनों में इस परियोजना की विस्तृत समीक्षा के लिए एक विशेष समिति गठित की जाएगी।

परियोजना का इतिहास और विवाद

बिदाड़ी टाउनशिप परियोजना का मूल रूप 2006 में तब शुरू हुआ जब तब के मुख्यमंत्री एच.डी. कुमरास्वामी ने इसे राज्य के विकास एजेंडा में शामिल किया था। तब से लेकर आज तक, विभिन्न सरकारों ने इस योजना को आगे बढ़ाया, लेकिन भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर लगातार विरोधी आवाजें उठती रही हैं। 2006 में जारी आदेशों के तहत पूरे गांवों को स्थानांतरित करने की योजना बनाई गई थी, जिससे स्थानीय किसानों में भय और असुरक्षा का माहौल बना।

राजनीतिक प्रतिप्रभाव

शिवाकुमार ने प्रोटेस्ट को “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया और कहा कि यह किसानों को भ्रमित करने की एक साजिश है। इस बयान के पीछे पूर्व प्रधानमंत्री एवं जनतादल (सेक्युलर) नेता एच.डी. देवेगौड़ा की विरोधी टिप्पणी का प्रतिपक्ष था, जिन्होंने एक दिन पहले ही इस परियोजना को वापस लेने की मांग की थी। शिवाकुमार ने कहा, “मैं किसानों और महिलाओं से कहता हूँ कि सरकार को ज़बरदस्ती ज़मीन अधिग्रहण करने की जरूरत नहीं है। यदि कोई जमीन बेचने को तैयार है, तो वह नोटिफिकेशन जारी होने के बाद ही कर सकता है।”

रियल एस्टेट कंपनियों की भूमिका

मुख्यमंत्री ने यह भी उजागर किया कि 2006 में इस टाउनशिप को रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ को सौंपा गया था और उस समय सरकार ने उनसे लगभग 400 करोड़ रुपये की शर्तें ली थीं। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “किसने डीएलएफ को 15 दिनों में सुरक्षा जमा देने और समझौता साइन करने को कहा?” यह बात दर्शाती है कि परियोजना को आगे बढ़ाने में रियल एस्टेट हितों को लेकर कई प्रश्न उठे हैं, लेकिन शिवाकुमार ने इसे रियल एस्टेट हितों के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक विकास के लिए बताया।

आगे का रास्ता

शिवाकुमार ने कहा कि समिति के कार्यप्रणाली और अध्यक्षता को लेकर अंतिम निर्णय कैबिनेट बैठक में तय किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उनका “ड्रीम प्रोजेक्ट” नहीं है, बल्कि पूर्व के कई मुख्यमंत्री और उद्योग मंत्रियों द्वारा लिये गये फैसले को जारी रखने का कार्य है। इस तरह की नीति का उद्देश्य कर्नाटक में शहरी विस्तार को नियंत्रित करना और साथ ही किसानों के अधिकारों की रक्षा करना है।