संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें श्रम संहिताओं और कृषि नीतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन की घोषणा की गई है।

मुख्य बातें

  • किसान और श्रमिक संगठनों ने केंद्र की श्रम और कृषि नीतियों के खिलाफ एकजुट होने का फैसला किया है।
  • श्रम संहिताओं (Labour Codes) को रद्द करने और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग।
  • छात्रों और युवाओं के आंदोलनों के साथ एकजुटता का प्रदर्शन।
  • विदेशी व्यापार समझौतों से कृषि और MSME क्षेत्र को होने वाले नुकसान की चेतावनी।

नई दिल्ली में आयोजित 'श्रमिकों और किसानों के राष्ट्रीय सम्मेलन' में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों (CTUs) के साझा मंच ने केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ संघर्ष को और अधिक तीव्र करने का संकल्प लिया है। यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब देश के छात्र और युवा राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के खिलाफ विरोध कर रहे हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खबर?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह आंदोलन केवल कृषि या श्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक और सामाजिक ढांचे में हो रहे बदलावों के खिलाफ एक व्यापक असंतोष को दर्शाता है। किसान और श्रमिक समूहों का यह गठबंधन सरकार की उन नीतियों को चुनौती दे रहा है जो बड़े कॉरपोरेट्स के पक्ष में मानी जा रही हैं।

सम्मेलन में आरोप लगाया गया कि पिछले छह वर्षों में छह आम हड़तालों के बावजूद, सरकार ने चार श्रम संहिताओं को अधिसूचित कर दिया है। इन संहिताओं का उद्देश्य ट्रेड यूनियनों को कमजोर करना और नियोक्ताओं (Employers) के उल्लंघन को कानूनी रूप दिया जाना है। इसके अलावा, प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों को भारतीय कृषि और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिए विनाशकारी बताया गया है।

केंद्र की नीतियां बड़े कॉर्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने और जमीनी स्तर के उत्पादकों को हाशिए पर धकेलने की दिशा में बढ़ रही हैं।

आंदोलनकारियों ने मांग की है कि एम.एस. स्वामीनाथन आयोग द्वारा निर्धारित फॉर्मूले के तहत न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को कानूनी दर्जा दिया जाए। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) के निजीकरण, विनिवेश और 'नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन 2.0' को तुरंत रोकने की भी मांग की है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारत में किसान और श्रमिक आंदोलनों का इतिहास बहुत पुराना है। 2020-21 के कृषि कानून विरोधी आंदोलन ने दुनिया भर का ध्यान खींचा था। वर्तमान में, श्रम सुधारों और शिक्षा नीति को लेकर उठ रहा विरोध उसी तरह के व्यापक असंतोष का संकेत है जो नीतियों के क्रियान्वयन और उनके सामाजिक प्रभाव को लेकर है।

क्या आप जानते हैं?: एम.एस. स्वामीनाथन आयोग ने कृषि क्षेत्र में किसानों की आय बढ़ाने के लिए लागत का कम से कम 50% अधिक मूल्य देने की सिफारिश की थी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. किसान और श्रमिक समूह मुख्य रूप से किन मांगों को लेकर विरोध कर रहे हैं?
वे श्रम संहिताओं को रद्द करने, MSP को कानूनी बनाने और सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण को रोकने की मांग कर रहे हैं।

2. इस आंदोलन का शिक्षा नीति से क्या संबंध है?
श्रमिक और किसान समूहों ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों और युवाओं के साथ एकजुटता व्यक्त की है।