धरवाड़ जिले ने 2026 मानसून में 19% बरसात की कमी के बावजूद 2.63 लाख हेक्टेयर पर 93% बीज बोाई लक्ष्य हासिल किया। विभाग ने बीज, उर्वरक की पर्याप्त आपूर्ति और डिजिटल फसल सर्वेक्षण को शुरू किया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • धरवाड़ में 19% कमी वाली बारिश के बावजूद 93% बीज बोाई पूर्ण हुई।
  • 2.63 लाख हेक्टेयर पर बीज बोाई, लक्ष्य 2.82 लाख हेक्टेयर।
  • बीज और उर्वरक की पर्याप्त आपूर्ति, डिजिटल फसल सर्वेक्षण शुरू।

2026 के मानसून में धरणी पर 173.3 मिमी की अनुमानित वर्षा के मुकाबले केवल 141.1 मिमी प्राप्त हुई, जिससे 19 % की कमी हुई। फिर भी, धरवाड़ जिला ने 2.82 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य में से 2.63 लाख हेक्टेयर पर 93 % बीज बोाई पूरी कर ली, जो कृषि विभाग की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।

बारिश की कमी के बावजूद बीज बोाई में उछाल

जून में कमजोर मानसून के कारण बीज बोाई में थोड़ी देर का विराम आया, परंतु जुलाई में अधिकांश क्षेत्रों में मध्यम से भारी बारिश ने कार्यशक्ति को पुनः गति प्रदान की। उपज विभाग के उपमुख्य आयुक्त स्नेहल आर. ने कहा कि फसल कटाई से पहले बीज वितरण और उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है।

बीज व उर्वरक की आपूर्ति

डिप्टी कमिश्नर ने बताया कि इस साल के लिये 18,457 क्विंटल बीज की योजना बनाई गई थी, जिसमें से 15,853 क्विंटल पहले ही किसानों को वितरित कर दी गई है और शेष 2,604 क्विंटल का स्टॉक सुरक्षित है। उर्वरक की बात करें तो 57,597 टन का कुल स्टॉक उपलब्ध था, जिसमें से 31,573 टन किसानों को बेचा जा चुका है, और 26,024 टन का पर्याप्त बैलेंस बना हुआ है।

डिजिटल फसल सर्वेक्षण पहल

धरवाड़ में 2026‑27 मानसून की फसल सर्वेक्षण प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। किसानों को अपनी फसलों की तस्वीरें अपलोड करके स्वतंत्र रूप से सर्वेक्षण करने की सुविधा प्रदान करने हेतु एक मोबाइल एप्लिकेशन गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध कराया गया है। यह डेटा कृषि बीमा, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल कटिंग प्रयोग, और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान नुकसान के आंकड़ों को सटीक रूप से रिकॉर्ड करने में उपयोग होगा।

भविष्य की चुनौतियाँ और संभावनाएँ

उपमुख्य आयुक्त ने कहा कि मानसून के दौरान जल की कमी न हो, इस हेतु जल आपूर्ति और पशुधन के लिए अतिरिक्त प्रबंध किए गए हैं। अब सवाल यह है कि जलवायु परिवर्तन की बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच इस तरह की सफलताएँ कैसे दोहराई जाएँगी। निरंतर आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन, डिजिटल निगरानी, और किसान‑केन्द्रित नीतियों से ही इस क्षेत्र में स्थायी वृद्धि संभव होगी।