अमेरिका और ईरान के बीच तीव्र युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हलचल मचा दी है। ब्रेंट और WTI दोनों ही 5% से अधिक उछाल के साथ $80‑$75 के स्तर पर पहुंच गए, जिससे वैश्विक महंगाई का डर फिर से बढ़ा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- US-ईरान संघर्ष से तेल कीमतों में 5% उछाल
- हॉर्मुज स्ट्रेट बंद होने से आपूर्ति जोखिम बढ़ा
- क्रूड कीमत $120 प्रति बैरल तक पहुँचने की संभावनाएं
अमेरिका और ईरान के बीच फिर से उभरा युद्ध, मध्य‑पूर्व में तनाव को चरम पर ले गया है। दोनों देशों ने एक‑दूसरे पर तीव्र हवाई स्ट्राइक किए, जबकि ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद कर दिया, जिससे विश्व के लगभग 20% कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हो गई। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 5% उछाल के साथ $80 के निकट पहुंच गई, जबकि अमेरिकी WTI भी 4% से अधिक बढ़कर $75 के स्तर पर ट्रेड कर रहा है।
पिछले समान घटनाक्रम
2022‑2023 में भी हॉर्मुज स्ट्रेट की अस्थायी बंदी ने तेल कीमतों में तीव्र उछाल लाया था। उस समय कीमतें $120 तक पहुंच गई थीं, जिससे कई विकासशील देशों में पेट्रोल‑डिज़ल की कीमतों में 50‑60 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी। इस बार भी वही जोखिम फिर से सामने है, क्योंकि ईरान की रणनीतिक जलमार्ग पर नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करता है।
महंगाई पर संभावित असर
कच्चे तेल की कीमत में हर $1 की बढ़ोतरी से पेट्रोल‑डिज़ल के रिटेल मूल्य में लगभग 0.5‑0.6 रुपये प्रति लीटर का इज़ाफ़ा हो सकता है, जैसा कि आर्थिक विशेषज्ञों ने बताया है। भारत सहित कई तेल‑आयात करने वाले देशों में यह उछाल सीधे उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) को ऊपर ले जाएगा, जिससे मौजूदा महंगाई के दुष्चक्र में नई रफ़्तार आ सकती है।
भारत की रणनीति और जोखिम प्रबंधन
भारतीय तेल कंपनियां पहले ही अपने स्टॉक को बढ़ाने की योजना बना रही हैं, जबकि सरकार ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर निवेश तेज़ करने का इरादा जताया है। लेकिन हॉर्मुज के बंद होने से समुद्री परिवहन लागत में वृद्धि और तेल की आपूर्ति में अनिश्चितता बनी रहेगी, जिससे भारत को दीर्घकालिक मूल्य स्थिरीकरण के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम रिज़र्व (SPR) को मजबूत करना पड़ेगा।
आगे क्या हो सकता है?
यदि युद्ध का विस्तार जारी रहता है और हॉर्मुज स्ट्रेट दीर्घकालिक रूप से बंद रहता है, तो कच्चे तेल की कीमतें $120 के स्तर के करीब फिर से पहुँच सकती हैं। इस परिदृश्य में वैश्विक वित्तीय बाजारों में जोखिम प्रीमियम बढ़ेगा, शेयर बाजार में अस्थिरता बढ़ेगी और कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को नई आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।