सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय मुजाहिदीन के दो कथित सदस्यों को जमानत देते हुए कहा कि बिना मुकदमे के लंबे समय तक जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है। आरोपी पिछले 12 वर्षों से हिरासत में थे।
मुख्य बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को सर्वोपरि माना।
- मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अज़हर पिछले 12 वर्षों से जेल में थे।
- अदालत ने कहा कि मुकदमे के जल्द संपन्न होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है।
- जमानत केवल दिल्ली के मामले से संबंधित है, अन्य मामलों की जांच जारी रहेगी।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कथित इंडियन मुजाहिदीन के दो सदस्यों, मोहम्मद साकिब अंसारी और वकार अज़हर को जमानत दे दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपियों को बिना किसी त्वरित सुनवाई के इतने लंबे समय तक हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंघन है।
अदालत ने मामले की समीक्षा करते हुए पाया कि ये दोनों आरोपी 2014 से जेल में हैं और दिल्ली में दर्ज एक आतंकवाद मामले के तहत उनकी न्यायिक हिरासत जारी है। पीठ ने नोट किया कि मुकदमे की प्रगति अत्यंत धीमी रही है और निकट भविष्य में इसके समाप्त होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला भारत की न्याय प्रणाली में 'त्वरित सुनवाई' (Speedy Trial) के महत्व को रेखांकित करता है। यह दर्शाता है कि कानून के शासन में, अपराध की गंभीरता के बावजूद, प्रक्रियात्मक देरी के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को अनिश्चित काल के लिए छीना नहीं जा सकता।
बिना मुकदमे के कारावास स्वयं में एक सजा है, जो न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
यह मामला 2011 में शुरू हुआ था जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कथित तौर पर राजस्थान मॉड्यूल के संबंध में सूचनाएं प्राप्त की थीं। आरोपियों पर राजस्थान और दिल्ली में अलग-अलग प्राथमिकी (FIR) दर्ज थीं। हालांकि, राजस्थान के एक मामले में उन्हें पहले ही जमानत या सजा का निलंबन मिल चुका था, जिससे दिल्ली मामले में उनकी जमानत का आधार मजबूत हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत किस आधार पर दी?
अदालत ने पाया कि आरोपियों का 12 वर्षों तक बिना मुकदमे के जेल में रहना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
2. क्या यह फैसला सभी मामलों पर लागू होगा?
नहीं, यह आदेश केवल इन विशिष्ट याचिकाकर्ताओं और दिल्ली के मामले में दी गई शर्तों के अधीन है।