केंद्रीय मंत्री रवनीत बित्तू ने सत्लुज फिल्म में 25,000 अनधिकृत दाहों के आंकड़े को ‘विवादित दावा’ कह कर साक्ष्य प्रस्तुत करने का आग्रह किया। फिल्म के ज़ी5 से हटाए जाने के बाद पंजाब में तीव्र विरोध और सिख संगठनों की पुनर्स्थापना की मांगें तेज़ हुई हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- रवनीत बित्तू ने सत्लुज फिल्म में 25,000 शहीदों के आंकड़े पर प्रमाण माँगा
- फिल्म को सुरक्षा कारणों से ज़ी5 से हटाया गया, पंजाब में विरोध बढ़ा
- जसवंत सिंह खलरा की जाँच और उनके हत्या के मामले का इतिहास पुनः चर्चा में
सत्लुज, दिलजीत दोसांझ की प्रमुख भूमिका वाली नई फ़िल्म, रिलीज़ के दो दिन बाद ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा सुरक्षा कारणों से ज़ी5 प्लेटफ़ॉर्म से हटाई गई। इस कदम पर पंजाब में सिख संगठनों, राजनीतिक दलों और आम जनता ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए, जबकि केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बित्तू ने फिल्म निर्माताओं को ‘विवादित दावे’ के प्रमाण पेश करने का आदेश दिया।
फ़िल्म का पृष्ठभूमि और कथा
हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित, मूल रूप से ‘Punjab ’95’ नाम से शुरू हुई यह फ़िल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खलरा की जीवनी पर आधारित है। खलरा ने 1984‑1994 के दौरान पंजाब में अनगिनत अनपहचाने शवों के अवैध दाह की जांच की थी। फ़िल्म में 25,000 ऐसे शवों के दाह का उल्लेख किया गया है, जिसे बित्तू ने ‘इतिहास का चयनात्मक पुनर्लेखन’ कहा।
रवनीत बित्तू का औपचारिक चुनौती
बित्तू ने कहा, “पंजाब का दर्दनाक इतिहास कोई स्क्रिप्ट नहीं जिसे चुनिंदा रूप से संपादित किया जा सके। मैं सत्लुज के निर्माता‑निर्देशक से मांग करता हूँ कि वे आधिकारिक दस्तावेज़, न्यायिक निष्कर्ष और प्रमाणित आँकड़े सार्वजनिक करें जो 25,000 अनधिकृत दाहों की संख्या को सिद्ध करते हों।” उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि यह आंकड़ा केवल अनुमान या आरोप पर आधारित है, तो इसे ‘स्थापित ऐतिहासिक तथ्य’ क्यों प्रस्तुत किया गया।
जसवंत सिंह खलरा का केस और न्यायिक परिप्रेक्ष्य
खलरा को 1995 में अमृतसर के बाहर अपहृत कर मार दिया गया, उनका शव कभी नहीं मिला। 2005 में एक सीबीआई कोर्ट ने उनके अपहरण और हत्या के लिए पूर्व डीएसपी जसपाल सिंह तथा एएसआई अमरजीत सिंह को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में उच्च न्यायालय ने कुछ दोषियों को मुक्त किया, पर कई को जीवन की सजा दी, जिसे 2011 में सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा। इस पृष्ठभूमि में 25,000 शहीदों का आंकड़ा कितना विश्वसनीय है, यह अभी भी सवाल बना हुआ है।
सिख संगठनों और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
श्रीमन ग़ुर्द्वारा परबन्धक समिति (SGPC) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने ज़ी5 से हटाने के खिलाफ कड़ी आवाज़ उठाई और फ़िल्म को फिर से प्रसारित करने की मांग की। उन्होंने कहा, “इतिहास को ईमानदारी से सामना करना चाहिए, सेंसरशिप से नहीं।” कई गाँवों में सार्वजनिक स्क्रीनिंग की योजना बनाकर जनता को फ़िल्म देखने का अवसर दिया जा रहा है। बित्तू ने कहा कि यदि निर्माताओं द्वारा विश्वसनीय प्रमाण नहीं दिया गया तो उन्हें कानूनी कदम उठाने का अधिकार है, ताकि इतिहास को ‘प्रोपेगैंडा’ के माध्यम से नहीं बदलने दिया जाए।