छह दशकों से शंकर मठ के शिष्य द्वारा नियोजित नई 25 फीट ऊँची स्वर्ण रथ को कांचिपुरम की सड़कों पर भव्य रथोत्सव में निकाला गया। इस रथ में एकाम्बरनाथर और एलावर्कुज़लीअम्मन की प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जो धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को उजागर करती हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • 25 फीट ऊँची नई स्वर्ण रथ कांचिपुरम में रथोत्सव के साथ निकाली गई
  • रथ में श्री एकाम्बरनाथर और श्री एलावर्कुज़लीअम्मन की मूर्तियाँ स्थापित
  • श्री जयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य स्वामिगल ने रथ निर्माण को आशीर्वाद दिया

कांचिपुरम शहर में रविवार शाम को अर्लुंगी एकाम्बरनाथर मंदिर की नई स्वर्ण रथ का भव्य रथोत्सव हुआ। 25 फीट ऊँची, 13 फीट लम्बी और 10 फीट चौड़ी इस रथ को भारत में सबसे बड़े स्वर्ण रथों में गिना जाता है। यह रथ शंकर मठ के प्रमुख श्री विजयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य स्वामिगल द्वारा पिछले वर्ष दिसम्बर में मंदिर के कुम्भाभिषेक के साथ समर्पित किया गया था।

पृष्ठभूमि एवं आध्यात्मिक महत्व

एतिहासिक रूप से कांचिपुरम का एकाम्बरनाथर मंदिर शैव धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। मंदिर में 7‑वर्षीय चक्र के साथ 12 प्रमुख देवालय हैं, जिनमें एकाम्बरनाथर (एक बृहस्पति) और एलावर्कुज़लीअम्मन प्रमुख देवी रूप में पूज्य हैं। स्वर्ण रथ का निर्माण श्री जयेंद्र सरस्वती शंकराचार्य स्वामिगल द्वारा प्रेरित किया गया, जिन्होंने सोने की धातु और लकड़ी के ढाँचे को एकत्र करने के लिए आशीर्वाद दिया।

रथोत्सव का आयोजन

रथ को राजा वेधि और मडा सड़कों से गुजरते हुए ले जाया गया, जहाँ स्थानीय अधिकारियों, मंत्री श्री एस. रमेश, आर. वी. रंजीतकुमार और एस. पी. के. थेनारासु सहित कई सम्मानित व्यक्तियों ने उपस्थित होकर कार्यक्रम को गौरवपूर्ण बनाया। 108 नादस्वरम और थविल वाद्यकार, कैलाश वाद्य और वैदिक श्लोकों के उच्चारण ने वातावरण को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया।

सांस्कृतिक प्रभाव और भविष्य की दृष्टि

इस प्रकार का महाकाव्य आयोजन न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करता है, बल्कि कांचिपुरम की सांस्कृतिक पहचान को भी वैश्विक स्तर पर उजागर करता है। भविष्य में शंकर मठ और स्थानीय प्रशासन इस रथ को नियमित रूप से विभिन्न तिथियों पर उपयोग करने की योजना बना रहे हैं, जिससे पर्यटन और स्थानीय आर्थिक विकास दोनों को लाभ होगा।

समापन टिप्पणी

स्वर्ण रथ का यह प्रथम सार्वजनिक परेड, शंकर मठ के आध्यात्मिक नेतृत्व और कांचिपुरम के धार्मिक समुदाय के बीच सहयोग का प्रतीक है, जो भविष्य में अधिक सांस्कृतिक पहल और सामाजिक एकजुटता की संभावनाएँ खोलता है।