TRG Datacenters की नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत विश्व में नौवें स्थान पर है, लेकिन केवल 22 समुद्री केबल और 40 इंटरनेट एक्सचेंज पॉइंट्स के कारण डिजिटल व्यवधान का जोखिम अधिक है। इस लेख में भारत की तैयारी, वैश्विक तुलना और संभावित प्रभावों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत विश्व में 9वें स्थान पर, भेद्यता स्कोर 23.4 के साथ।
- केवल 22 समुद्री केबल और 40 IXPs, जो नेटवर्क लचीलापन घटाते हैं।
- संयुक्त राज्य अमेरिका 115 केबल और 209 IXPs के साथ सबसे तेज़ पुनर्प्राप्ति क्षमता रखता है।
डिजिटल युग में इंटरनेट का व्यवधान राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक संपर्कों पर गहरा असर डाल सकता है। TRG Datacenters, जो एक अमेरिकी कोलोकेशन एवं डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर कंपनी है, ने 100 से अधिक देशों की डिजिटल भेद्यता का मूल्यांकन किया और भारत को 23.4 के स्कोर के साथ नौवें स्थान पर रखा। यह स्कोर दर्शाता है कि भारत को बड़े पैमाने पर इंटरनेट ब्लैकआउट का सामना करने में सीमित क्षमता है।
वैश्विक तुलना: केबल और एक्सचेंज पॉइंट्स की भूमिका
समुद्री केबलों की संख्या किसी देश की अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी की माप है। भारत के पास मात्र 22 केबल हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका के पास 115 केबल हैं। इसी तरह, इंटरनेट एक्सचेंज पॉइंट्स (IXPs) के माध्यम से घरेलू नेटवर्क डेटा को सीधे आदान‑प्रदान कर सकते हैं, जिससे latency घटती है और लागत कम होती है। भारत में 40 IXPs हैं, जबकि अमेरिका में 209 और यूके में 30 हैं। इस अंतर के कारण अमेरिकी नेटवर्क किसी भी व्यवधान के बाद तेज़ी से पुनः स्थापित हो सकता है।
जनसंख्या और इंटरनेट उपयोग का प्रभाव
भारत की जनसंख्या का 70 % इंटरनेट का उपयोग करता है, जो इंडोनेशिया (72.8 %) से थोड़ा कम है। हालांकि, इंटरनेट उपयोग में वृद्धि के साथ, एक बड़े पैमाने पर ब्लैकआउट का आर्थिक नुकसान भी बढ़ेगा। ऑस्ट्रेलिया 96.1 % उपयोग दर के साथ अग्रणी है, जबकि यूके और यूएस क्रमशः 95.5 % और 94.7 % पर हैं। इस संदर्भ में, भारत को न केवल बुनियादी ढाँचा बढ़ाना होगा, बल्कि ग्रामीण एवं दूरदराज़ क्षेत्रों में पहुँच सुनिश्चित करनी होगी।
संभावित जोखिम और नीति सुझाव
कम केबल और IXP संख्या का अर्थ है कि यदि कोई प्रमुख समुद्री केबल क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो ट्रैफ़िक को पुनः रूट करने के विकल्प सीमित रहेंगे। इससे डेटा गति में गिरावट, व्यवसायिक नुकसान और आपातकालीन सेवाओं में व्यवधान हो सकता है। नीति निर्माताओं को समुद्री केबल नेटवर्क का विस्तार, अधिक IXPs की स्थापना और वैकल्पिक बैक‑अप समाधान (जैसे सैटेलाइट इंटरनेट) को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
भविष्य की दिशा
डिजिटल आत्मनिर्भरता की ओर भारत की पहल, जैसे ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘नेटवर्क सॉलिडरिटी’ कार्यक्रम, इस अंतर को पाटने में मददगार हो सकते हैं। लेकिन वास्तविक प्रभाव तभी दिखेगा जब बुनियादी ढाँचा, नियामक समर्थन और निजी क्षेत्र की निवेश क्षमता एक साथ मिलकर काम करें। अंततः, इंटरनेट ब्लैकआउट से निपटने की तैयारी सिर्फ तकनीकी आंकड़ों से नहीं, बल्कि रणनीतिक योजना और निरंतर निवेश से तय होती है।