बॉम्बे हाई कोर्ट ने कॉमेडियन कुशल कामरा की याचिका में केंद्र सरकार को 29 जुलाई तक उत्तर देने का निर्देश दिया है, जिसमें 2025 में संशोधित IT नियमों के तहत साहयोग पोर्टल की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है। इस निर्णय से ऑनलाइन सामग्री प्रतिबंध के मौजूदा ढाँचे में महत्वपूर्ण बदलाव की संभावना बनती है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- केंद्रीय सरकार को 29 जुलाई तक साहयोग पोर्टल की संवैधानिक वैधता पर उत्तर देना होगा।
- साहयोग पोर्टल को बिना नोटिस और कारण के सामग्री हटाने की अनुमति देने का आरोप है।
- याचिका राज्य‑स्तर पर सामग्री‑ब्लॉकिंग अधिकारों को चुनौती देती है, जो संघ के अधिकार क्षेत्र में आती है।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 16 जुलाई, 2026 को एक विभाजन बेंच के माध्यम से कुणाल कामरा बनाम केंद्र मामले में केंद्र सरकार को 29 जुलाई तक अपना उत्तर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। यह आदेश कॉमेडियन द्वारा दायर याचिका के बाद आया, जिसमें 2025 में संशोधित IT नियमों के अनुच्छेद 3(1)(d) और साहयोग पोर्टल की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
पृष्ठभूमि
साहयोग पोर्टल, जो इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा विकसित किया गया है, का उद्देश्य ऑनलाइन मध्यस्थों के साथ समन्वय करके आपत्तिजनक सामग्री को तेज़ी से ब्लॉक करना था। हालांकि, कामरा ने दावा किया कि यह पोर्टल मौजूदा कानूनी सुरक्षा तंत्र, विशेषकर IT अधिनियम की धारा 69ए, को बायपास करता है और सामग्री हटाने के लिए 36‑घंटे की अनिवार्य समय सीमा लागू करता है, जिससे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।
कामरा की याचिका के मुख्य दावे
याचिका ने तीन प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला: (i) संदेश न देना – पोर्टल के माध्यम से हटाए गए कंटेंट के निर्माता को कोई पूर्व सूचना नहीं मिलती; (ii) सुनवाई का अधिकार न होना – सामग्री को ब्लॉक करने से पहले प्रभावित पक्ष को अपने पक्ष में तर्क रखने का अवसर नहीं दिया जाता; (iii) कारणहीन आदेश – हटाने के आदेश लिखित कारण के बिना जारी किए जाते हैं, जिससे पारदर्शिता की कमी स्पष्ट होती है।
संवैधानिक प्रभाव और भविष्य की संभावनाएँ
कामरा की याचिका का एक प्रमुख पहलू यह है कि यह केंद्र द्वारा सामग्री‑ब्लॉकिंग की शक्ति को राज्य‑स्तर पर सौंपने के संवैधानिक प्रश्न को उठाती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए इस प्रकार के अधिकारों का अनुचित हस्तांतरण असंवैधानिक माना जा सकता है। यदि कोर्ट इस तर्क को स्वीकार करता है, तो डिजिटल कंटेंट के नियमन में केंद्रीय सरकार की प्राथमिकता को पुनः स्थापित किया जा सकता है।
आगे का मार्ग
अगली सुनवाई 14 अगस्त, 2026 को निर्धारित है, जबकि कामरा को 6 अगस्त तक अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने का अवसर दिया गया है। इस मामले का नतीजा न केवल भारत में इंटरनेट गवर्नेंस को, बल्कि विश्व स्तर पर डिजिटल अधिकारों के संरक्षण को भी प्रभावित कर सकता है।