मोदी सरकार ने देश में स्वदेशी स्मार्टफोन ब्रांडों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए 'मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम' (MPMS) को मंजूरी दी है। ₹62,500 करोड़ के इस भारी-भरकम बजट के जरिए भारत न केवल विनिर्माण को बढ़ावा देगा, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी हिस्सेदारी भी मजबूत करेगा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- केंद्रीय कैबिनेट ने 5 वर्षों के लिए ₹62,500 करोड़ के बजट वाली MPMS योजना को मंजूरी दी है।
- यह योजना पूर्ववर्ती PLI-LSEM योजना का स्थान लेगी, जो 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है।
- भारतीय ब्रांडों को डिजाइन और अनुसंधान (R&D) के लिए 3 प्रतिशत का अतिरिक्त वित्तीय प्रोत्साहन मिलेगा।
- इस नीति का लक्ष्य मोबाइल विनिर्माण को ₹39 लाख करोड़ तक पहुंचाना और 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार सृजित करना है।
भारत को वैश्विक विनिर्माण महाशक्ति बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक और ऐतिहासिक कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (MPMS) को मंजूरी दे दी है, जिसके लिए ₹62,500 करोड़ का विशाल बजटीय आवंटन किया गया है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य न केवल भारत में मोबाइल फोन के उत्पादन को गति देना है, बल्कि 'मेड इन इंडिया' ब्रांडों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना भी है। इसके समानांतर, सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए सेमीकॉन-2 योजना के तहत ₹1.26 लाख करोड़ की अतिरिक्त मंजूरी दी गई है।
PLI से MPMS की ओर: एक रणनीतिक बदलाव
यह नई MPMS योजना पांच वर्षों की अवधि के लिए लागू की जाएगी। यह योजना बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण के लिए पूर्व में संचालित प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI-LSEM) योजना का स्थान लेगी, जिसकी अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुकी है। सरकार का मानना है कि पिछले एक दशक में भारत ने असेंबली के स्तर पर बेहतरीन सफलता हासिल की है, लेकिन अब समय आ गया है कि देश में मूल्य संवर्धन (Value Addition) और गहरे विनिर्माण (Deep Manufacturing) को बढ़ावा दिया जाए।
प्रोत्साहन और स्थानीयकरण पर विशेष ध्यान
इस योजना की रूपरेखा को बेहद रणनीतिक तरीके से तैयार किया गया है। इसके तहत मोबाइल फोन निर्माताओं को उनकी कुल बिक्री पर 2.25 प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत तक का वित्तीय प्रोत्साहन (Incentive) दिया जाएगा। स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए, यदि कंपनियां मोबाइल फोन के मुख्य पुर्जे और सब-असेंबली भारत से ही खरीदती हैं, तो उन्हें 1.5 प्रतिशत का अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय ब्रांडों को डिजाइन, अनुसंधान और विकास (R&D) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए बिक्री पर 3 प्रतिशत का विशेष प्रोत्साहन दिया जाएगा।
विशाल आर्थिक लक्ष्य और रोजगार के अवसर
सरकार को उम्मीद है कि इस नीतिगत हस्तक्षेप से भारत में मोबाइल फोन का कुल उत्पादन लगभग ₹39 लाख करोड़ के पार पहुंच जाएगा, जिससे देश के निर्यात में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। इसके अलावा, इस योजना के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने का अनुमान है, जो देश के कुशल और अर्ध-कुशल युवाओं के लिए वरदान साबित होगा। वर्ष 2014-15 के बाद से देश के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण में सात गुना और निर्यात में 11 गुना की वृद्धि दर्ज की जा चुकी है, जो इस क्षेत्र की विशाल क्षमता को दर्शाती है।
भारत का त्रि-स्तरीय मोबाइल इकोसिस्टम
वर्तमान में भारत के मोबाइल विनिर्माण परिदृश्य को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। पहले स्थान पर कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स आते हैं, जिनमें फॉक्सकॉन (जो एप्पल के लिए निर्माण करती है), टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और डिक्सन टेक्नोलॉजीज शामिल हैं। डिक्सन जैसी स्वदेशी कंपनियां शाओमी, मोटोरोला और सैमसंग जैसी वैश्विक कंपनियों के लिए हैंडसेट असेंबल करती हैं। दूसरी श्रेणी में सैमसंग, ओप्पो और वीवो जैसे वैश्विक ब्रांड हैं जिनकी भारत में अपनी विनिर्माण इकाइयां हैं। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी में 'लावा' जैसे भारतीय स्वदेशी ब्रांड शामिल हैं, जिन्हें इस योजना से सबसे अधिक लाभ मिलने की उम्मीद है।