वैज्ञानिक अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग करके विमानों द्वारा छोड़े जाने वाले 'कंट्रेल्स' (सफेद लकीरों) को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग में बड़ा योगदान देते हैं। ब्रिटेन में शुरू होने वाला 'ऑपरेशन ब्लू स्काईज' इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।
- विमानों के पीछे बनने वाली सफेद लकीरें (कंट्रेल्स) ग्लोबल वार्मिंग में विमानन क्षेत्र के कुल प्रभाव का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हो सकती हैं।
- ब्रिटेन सरकार और गूगल मिलकर 'ऑपरेशन ब्लू स्काईज' के माध्यम से AI का परीक्षण कर रहे हैं।
- विमानों की ऊंचाई में मात्र 2,000 फीट का बदलाव करके इन हानिकारक बादलों को बनने से रोका जा सकता है।
आसमान में विमानों के पीछे दिखने वाली सफेद लकीरें, जिन्हें वैज्ञानिक रूप से 'कंट्रेल्स' (Contrails) कहा जाता है, केवल दृश्य प्रदूषण नहीं हैं, बल्कि ये जलवायु परिवर्तन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हालिया शोधों से पता चला है कि ये बर्फ के क्रिस्टल वाले बादल गर्मी को पृथ्वी के वायुमंडल में रोक लेते हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ती है। अब, इस समस्या से निपटने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को मैदान में उतारा जा रहा है।
ब्रिटेन में शुरू होने वाला £5 मिलियन का एक नया परीक्षण, जिसे 'ऑपरेशन ब्लू स्काईज' (Operation Blue Skies) नाम दिया गया है, यह जांच करेगा कि क्या AI विमानों को उन क्षेत्रों से दूर रखने में मदद कर सकता है जहाँ गर्म कंट्रेल्स बनने की संभावना अधिक होती है। यह परियोजना मुख्य रूप से उत्तरी अटलांटिक कॉरिडोर के शैनविक ओशनिक एयरस्पेस (Shanwick Oceanic airspace) पर केंद्रित होगी, जो वैश्विक कंट्रेल्स वार्मिंग में लगभग 5% का योगदान देता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, विमानन उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कार्बन उत्सर्जन कम करना नहीं है, बल्कि उन अप्रत्यक्ष प्रभावों को भी नियंत्रित करना है जो वायुमंडल की संरचना को बदलते हैं। यदि AI के माध्यम से कंट्रेल्स को प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है, तो यह विमानन क्षेत्र के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने का एक अत्यंत कुशल और कम लागत वाला तरीका साबित होगा।
कंट्रेल्स वार्मिंग विमानन से होने वाले कुल जलवायु वार्मिंग के लगभग एक-तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार हो सकती है।
इस 30 महीने के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट में गूगल (Google), ब्रिटेन सरकार, मेट ऑफिस, और कैम्ब्रिज एवं इंपीरियल कॉलेज लंदन के शोधकर्ता शामिल हैं। गूगल उपग्रह चित्रों और उड़ान डेटा का उपयोग करके उन मौसम पैटर्न की पहचान करेगा जहाँ कंट्रेल्स बनने की संभावना सबसे अधिक है। यह जानकारी एयर ट्रैफिक कंट्रोल (NATS) को भेजी जाएगी, जो पायलटों को विमान की ऊंचाई में थोड़ा बदलाव करने का निर्देश दे सके।
यह बदलाव इतना सूक्ष्म होगा कि यात्रियों को पता भी नहीं चलेगा। विमान की ऊंचाई में लगभग 2,000 फीट का बदलाव किया जाएगा, जो पहले से ही अशांति (turbulence) से बचने के लिए सामान्य रूप से किया जाता है। हालांकि, कुछ आलोचकों का तर्क है कि ऊंचाई बदलने से ईंधन की खपत बढ़ सकती है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अतिरिक्त CO2 उत्सर्जन (1% से कम) की तुलना में कंट्रेल्स से होने वाला जलवायु लाभ कहीं अधिक है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: कंट्रेल्स (Contrails) क्या होते हैं?
उत्तर: जब विमान के इंजन से निकलने वाली गर्म गैसें ऊंचाई पर मौजूद ठंडी हवा से मिलती हैं, तो वे बर्फ के क्रिस्टल बनाती हैं, जिन्हें कंट्रेल्स कहा जाता है।
प्रश्न 2: क्या ऊंचाई बदलने से ईंधन ज्यादा खर्च होगा?
उत्तर: हाँ, थोड़ा अधिक ईंधन खर्च हो सकता है, लेकिन शोध बताते हैं कि यह नुकसान कंट्रेल्स के कारण होने वाले जलवायु नुकसान की तुलना में नगण्य है।