इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव एस. कृष्णन ने स्पष्ट किया है कि सोशल मीडिया पर 99% से अधिक कंटेंट प्लेटफॉर्म के अपने नियमों के तहत हटाया जाता है, न कि सरकारी आदेशों पर। उन्होंने वैश्विक कंपनियों को भारत की भाषाई और सांस्कृतिक बारीकियों को समझने की चेतावनी दी है।
- सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर 99% से अधिक कंटेंट हटाना कंपनियों के अपने सामुदायिक दिशानिर्देशों (Community Guidelines) का परिणाम है।
- सरकार द्वारा कंटेंट ब्लॉक करने की शक्ति (धारा 69A) का उपयोग बहुत ही सीमित और विशिष्ट परिस्थितियों में किया जाता है।
- MeitY ने वैश्विक कंपनियों को भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
नई दिल्ली में आयोजित 'बिजनेस टुडे इंडिया@100' कार्यक्रम के दौरान, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव एस. कृष्णन ने सोशल मीडिया कंटेंट मॉडरेशन को लेकर एक महत्वपूर्ण खुलासा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अक्सर यह धारणा गलत होती है कि इंटरनेट से सामग्री हटाने के पीछे मुख्य रूप से सरकार का हाथ होता है।
कृष्णन के अनुसार, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाए जाने वाले कुल कंटेंट का 99% से अधिक हिस्सा स्वयं कंपनियों के अपने सामुदायिक दिशानिर्देशों के आधार पर हटाया जाता है। इसका अर्थ है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स (ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म अपने आंतरिक नियमों और एल्गोरिदम का उपयोग करके अधिकांश निर्णय लेते हैं।
सरकार की शक्तियां और सीमाएं
सरकार की भूमिका पर चर्चा करते हुए, सचिव ने बताया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A के तहत कंटेंट को ब्लॉक करने की शक्ति केवल बहुत ही गंभीर और विशिष्ट परिस्थितियों में ही लागू होती है। इसमें देश की सुरक्षा, भारत का बचाव, सार्वजनिक व्यवस्था और विदेशी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध जैसे आधार शामिल हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा, "हम बहुत ही संयम के साथ और बहुत ही कम मामलों में इन शक्तियों का उपयोग करते हैं। सरकार केवल इसलिए किसी कंटेंट को ब्लॉक नहीं कर सकती क्योंकि कोई अधिकारी उसे आपत्तिजनक मानता है; उसे कानून द्वारा निर्धारित कानूनी सीमा को पूरा करना होगा।"
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह स्पष्टीकरण डिजिटल संप्रभुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच के संघर्ष को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। जैसे-जैसे भारत में इंटरनेट का उपयोग बढ़ रहा है, वैश्विक टेक दिग्गजों और स्थानीय कानूनों के बीच सामंजस्य बिठाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को केवल दृश्य सामग्री पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें भारत के जटिल सांस्कृतिक और भाषाई संदर्भों को समझना होगा।
कृष्णन ने चेतावनी दी कि वैश्विक प्लेटफॉर्म्स को भारत की भाषाई विविधता के प्रति सतर्क रहना चाहिए। उन्होंने उदाहरण दिया कि कई बार हिंसा या यौन शोषण की घटनाएं केवल दृश्य रूप में स्पष्ट नहीं होतीं, और यदि प्लेटफॉर्म सांस्कृतिक संदर्भ नहीं समझते, तो वे हानिकारक सामग्री को पहचानने में विफल हो सकते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में इंटरनेट विनियमन का इतिहास सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 से जुड़ा है। समय के साथ, सोशल मीडिया के उदय ने सरकार को धारा 69A और मध्यस्थों (Intermediaries) के लिए धारा 79 जैसे प्रावधानों को और अधिक प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए प्रेरित किया है, ताकि डिजिटल स्पेस को सुरक्षित बनाया जा सके।
Frequently Asked Questions
1. क्या सरकार अपनी मर्जी से कोई भी सोशल मीडिया पोस्ट हटा सकती है?
नहीं, सरकार केवल धारा 69A के तहत निर्धारित विशिष्ट कानूनी आधारों (जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा) पर ही आदेश दे सकती है।
2. 'सेफ हार्बर' (Safe Harbour) क्या है?
आईटी अधिनियम की धारा 79 के तहत, प्लेटफॉर्म्स को तीसरे पक्ष द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट के लिए तब तक कानूनी सुरक्षा प्राप्त है जब तक वे सरकारी नियमों का पालन करते हैं।