चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के जैव प्रौद्योगिकी शोधकर्ताओं ने एक क्रांतिकारी दो-चरणीय फिल्टरिंग डिवाइस विकसित किया है जो रसोई के गंदे पानी को साफ कर उसे बागवानी और सफाई जैसे कामों में पुन: उपयोग करने योग्य बनाता है। यह आविष्कार भारत के बढ़ते जल संकट के बीच पानी बचाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
- चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं को 'वेस्ट वॉटर फिल्टरिंग डिवाइस' के लिए पेटेंट मिला है।
- यह उपकरण रसोई के अपशिष्ट जल को दो चरणों में साफ करता है।
- साफ किए गए पानी का उपयोग बागवानी, फर्श की सफाई और टॉयलेट फ्लशिंग के लिए किया जा सकता है।
- यह तकनीक भारत में 60 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा सामना किए जा रहे जल संकट का समाधान दे सकती है।
भारत में जल संकट एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है, जहाँ अत्यधिक भूजल दोहन और अनियमित मानसून के कारण देश की एक बड़ी आबादी पानी की कमी से जूझ रही है। इस चुनौतीपूर्ण समय में, चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी (CU) के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के शोधकर्ताओं ने एक अभूतपूर्व समाधान पेश किया है। शोधकर्ताओं की एक टीम ने एक ऐसे उपकरण का पेटेंट प्राप्त किया है जो रसोई के अपशिष्ट जल (Kitchen Wastewater) को फिल्टर करके उसे घरेलू कार्यों में पुन: उपयोग के लायक बनाता है।
इस नवाचार का नेतृत्व प्रोफेसर (डॉ.) अनु कुमार ने किया है, जिनके साथ जैव प्रौद्योगिकी विभाग के छात्र भानु कृष्ण और शिवानी भी शामिल थे। भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय ने अप्रैल 2026 में इस 'वेस्ट वॉटर फिल्टरिंग डिवाइस' को आधिकारिक मान्यता दी। यह उपकरण विशेष रूप से उस पानी को लक्षित करता है जो बर्तन धोने या रसोई के अन्य कार्यों के दौरान निकलता है, जिसे आमतौर पर बिना किसी उपचार के सीधे ड्रेनेज सिस्टम में बहा दिया जाता है।
तकनीकी कार्यप्रणाली और नवाचार
यह डिवाइस एक उन्नत दो-चरणीय (Two-stage) प्रक्रिया पर काम करता है। जब रसोई का गंदा पानी फिल्टरिंग डिवाइस के मुख्य आवास (Main Housing) में प्रवेश करता है, तो यह सबसे पहले सिलिका-लेपित पॉलीयूरेथेन शीटों (Silica-coated polyurethane sheets) से होकर गुजरता है। ये शीटें पानी में मौजूद तेल और साबुन के कणों (Soap micelles) को सोखने का प्राथमिक कार्य करती हैं। इसके बाद, पानी दूसरे चरण में जाता है जहाँ एक्टिवेटेड चारकोल (Activated Charcoal) मौजूद होता है, जो बचे हुए दूषित तत्वों को सोखकर पानी को और अधिक शुद्ध बनाता है।
प्रोफेसर अनु कुमार के अनुसार, 'यह विचार 2018 में शिमला में आए जल संकट से प्रेरित था, जहाँ हमने महसूस किया कि घरेलू गतिविधियों में बहुत सारा पानी बर्बाद हो जाता है जिसकी आवश्यकता पीने योग्य पानी की नहीं होती।'
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत दुनिया में अपशिष्ट जल के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारत में प्रतिदिन लगभग 112 बिलियन लीटर शहरी अपशिष्ट जल उत्पन्न होता है, लेकिन इसमें से केवल 8% का ही पुनर्चक्रण (Recycle) किया जाता है। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी का यह किफायती और सरल समाधान इस अंतर को पाटने में मदद कर सकता है, जिससे ताजे पीने योग्य पानी की मांग में भारी कमी आएगी।
| विशेषता | पारंपरिक ड्रेनेज सिस्टम | CU का नया फिल्टरिंग डिवाइस |
|---|---|---|
| उपयोग का तरीका | सीधे नालियों में बहा दिया जाता है | पुन: उपयोग के लिए संग्रहीत किया जाता है |
| प्रक्रिया | कोई उपचार नहीं | दो-चरणीय (पॉलीयूरेथेन + चारकोल) |
| पर्यावरणीय प्रभाव | जल संसाधनों की बर्बादी | जल संरक्षण और स्थिरता |
इस फिल्टर किए गए पानी का उपयोग बागवानी, लॉन की सिंचाई, फर्श की सफाई और टॉयलेट फ्लशिंग जैसे गैर-पेय कार्यों के लिए किया जा सकता है। यह न केवल पानी की बचत करेगा बल्कि शहरी क्षेत्रों में जल प्रबंधन के तरीके को भी बदल देगा।
Frequently Asked Questions
1. क्या इस फिल्टर किए गए पानी को पिया जा सकता है?
नहीं, यह उपकरण केवल गैर-पेय (Non-potable) कार्यों जैसे सफाई और बागवानी के लिए पानी को शुद्ध करता है।
2. यह उपकरण किन चीजों को हटाता है?
यह मुख्य रूप से तेल, ग्रीस और साबुन के झाग (Soap micelles) जैसे दूषित तत्वों को हटाने के लिए डिज़ाइन किया गया है।