मद्रास उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थendowments (HR&CE) विभाग द्वारा नियुक्त कार्यकारी अधिकारी (EO) मंदिर की धार्मिक और पारंपरिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि अधिकारियों की भूमिका केवल संपत्ति के प्रबंधन तक सीमित होनी चाहिए।
- कार्यकारी अधिकारी (EO) केवल मंदिर की चल और अचल संपत्ति के रखरखाव तक ही सीमित रहेंगे।
- धार्मिक अनुष्ठान, परंपराएं और रीति-रिवाज केवल परंपराओं के जानकार व्यक्तियों द्वारा ही किए जाने चाहिए।
- EO को 'फिट पर्सन' के रूप में केवल असाधारण और अल्पकालिक परिस्थितियों में ही नियुक्त किया जा सकता है।
- एक ही व्यक्ति को ट्रस्टी और EO दोनों की भूमिका निभाने से 'चेक एंड बैलेंस' का सिद्धांत खत्म हो जाएगा।
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा है कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थendowments (HR&CE) विभाग द्वारा विभिन्न मंदिरों में नियुक्त किए गए कार्यकारी अधिकारी (EO) मंदिर की धार्मिक, प्रथागत और पारंपरिक गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों का कार्य केवल मंदिर की चल (राजस्व सहित) और अचल संपत्तियों के रखरखाव तक सीमित होना चाहिए।
यह निर्णय एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान आया, जिसे मंदिर कार्यकर्ता टी.आर. रमेश द्वारा दायर किया गया था। याचिका में मांग की गई थी कि HR&CE विभाग अपने अधिकारियों को 'फिट पर्सन' के रूप में नियुक्त करके मंदिरों के प्रशासन में अत्यधिक नियंत्रण न रखे। अदालत ने विशेष रूप से चेन्नई के प्रसिद्ध पार्थसारथी स्वामी मंदिर का उल्लेख किया, जिसका प्रशासन एक ऐतिहासिक योजना के तहत संचालित होता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला मंदिर प्रशासन में सरकारी नियंत्रण और धार्मिक स्वायत्तता के बीच के संघर्ष को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि एक ही अधिकारी प्रशासनिक और धार्मिक दोनों शक्तियां रखता है, तो शक्ति के दुरुपयोग की संभावना बढ़ जाती है।
"यदि दोनों कार्य एक ही व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं, तो नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली समाप्त हो जाएगी... शक्ति का रुझान भ्रष्टाचार की ओर होता है और पूर्ण शक्ति पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है।" - अदालत की टिप्पणी।
अदालत ने 2015 के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि कार्यकारी अधिकारियों को ट्रस्टियों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। न्यायाधीशों ने चिंता व्यक्त की कि कई मंदिरों का वार्षिक बजट करोड़ों में होता है, और ऐसे में एक बहु-सदस्यीय ट्रस्ट बोर्ड और एक सरकारी अधिकारी (EO) की उपस्थिति सत्ता के उचित प्रयोग को सुनिश्चित करती है।
धार्मिक मामलों पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए, बेंच ने कहा कि 'कुंभभिषेकम' जैसे अनुष्ठानों की तिथि, समय और विधि पूरी तरह से धार्मिक पहलू हैं। कोई भी गतिविधि जो सीधे पूजा-अर्चना से जुड़ी है, वह धर्म के दायरे में आती है और उसमें प्रशासनिक अधिकारियों का हस्तक्षेप वर्जित है।
Frequently Asked Questions
1. क्या कार्यकारी अधिकारी मंदिर के धन का उपयोग कर सकते हैं?
हाँ, उनका कार्य मंदिर की चल और अचल संपत्ति तथा राजस्व का प्रबंधन और रखरखाव करना है।
2. क्या EO मंदिर के अनुष्ठानों का निर्णय ले सकते हैं?
नहीं, अदालत के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान और परंपराएं केवल उन लोगों द्वारा की जानी चाहिए जो मंदिर की रीति-रिवाजों के जानकार हों।