NEET-UG पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए गठित समिति की संरचना पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि मौजूदा समिति उच्च स्तर के सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
- याचिकाकर्ताओं ने उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) के पुनर्गठन की मांग की है।
- तर्क दिया गया है कि समिति गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस के शीर्ष अधिकारियों की जांच करने में सक्षम नहीं हो सकती।
- सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आश्वासन दिया कि समिति न्यायालय की निगरानी में काम करेगी।
नई दिल्ली: NEET-UG परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर हुई पुलिसिया कार्रवाई की जांच को लेकर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। याचिकाकर्ताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष एक महत्वपूर्ण आवेदन दायर कर मौजूदा 'उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति' (HPEC) के पुनर्गठन की मांग की है।
याचिकाकर्ताओं, जिनका प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण, प्रशांत भूषण और नेहा राठी कर रहे हैं, ने स्पष्ट किया कि वे समिति के सदस्यों की व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा पर सवाल नहीं उठा रहे हैं। हालांकि, उनका तर्क है कि वर्तमान समिति में उन अधिकारियों की भूमिका की जांच करने के लिए आवश्यक विशेषज्ञता और स्वायत्तता की कमी है, जो केंद्रीय कार्यपालिका, गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के उच्चतम स्तर पर कार्यरत हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल पुलिस कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में संस्थागत जवाबदेही और उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की जांच करने की क्षमता का एक लिटमस टेस्ट है। यदि जांच केवल जमीनी स्तर के पुलिसकर्मियों तक सीमित रहती है, तो यह शीर्ष नेतृत्व की जवाबदेही को पूरी तरह से दरकिनार कर सकती है।
जांच समिति को कार्यपालिका के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए ताकि वह शीर्ष स्तर के अधिकारियों की भूमिका का निष्पक्ष परीक्षण कर सके।
याचिका में विशेष रूप से गृह मंत्री अमित शाह, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और RAF की आईजी सीमा धुंधिया जैसे उच्चाधिकारियों की भूमिका की जांच करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जांच में यह देखना अनिवार्य है कि क्या बल का प्रयोग आनुपातिक था और क्या पुलिसकर्मियों को वर्दी या नेम टैग न पहनने के निर्देश दिए गए थे ताकि उनकी पहचान छिपाई जा सके।
दूसरी ओर, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इन आशंकाओं को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता अदालत पर अपनी इच्छा थोपने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने समिति के सदस्यों और सरकारी अधिकारियों के बीच संभावित 'संस्थागत सम्मान' (institutional deference) का मुद्दा भी उठाया, जो निष्पक्ष जांच में बाधा बन सकता है।
Frequently Asked Questions
1. याचिकाकर्ता समिति के सदस्यों की ईमानदारी पर सवाल क्यों नहीं उठा रहे हैं?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उनका मुद्दा सदस्यों की व्यक्तिगत ईमानदारी नहीं, बल्कि समिति की संरचना और उच्च अधिकारियों की जांच करने की उनकी क्षमता है।
2. वर्तमान HPEC समिति में कौन शामिल है?
इस समिति में पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी (अध्यक्ष), पूर्व न्यायाधीश रवि शंकर झा, पूर्व न्यायाधीश शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी डॉ. एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।