दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि यदि दो पुरुष लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं, तो उन्हें एक-दूसरे के लिए चिकित्सा सहमति (medical consent) देने से क्यों रोका जा रहा है।

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने समलैंगिक जोड़ों के लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता के दायरे में रखने का संकेत दिया।
  • अदालत ने केंद्र सरकार से मेडिकल कंसेंट (चिकित्सा सहमति) के अधिकार पर स्पष्ट रुख मांगा है।
  • मामला क्वीर (Queer) साथियों को आपातकालीन स्थिति में एक-दूसरे के लिए निर्णय लेने की अनुमति देने से जुड़ा है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के समक्ष महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून दो पुरुषों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप की अनुमति देने से नहीं रोकता है। यह टिप्पणी उस याचिका पर आई है जिसमें समलैंगिक (Queer) भागीदारों को एक-दूसरे के लिए चिकित्सा सहमति देने का अधिकार देने की मांग की गई है।

सुनवाई के दौरान, अदालत ने केंद्र से पूछा, 'यदि समलैंगिक जोड़े रिश्ते में रह सकते हैं, तो उन्हें एक-दूसरे के लिए चिकित्सा निर्णय लेने के अधिकार से क्यों वंचित किया जा रहा है?' यह मामला न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है, बल्कि स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में मानवाधिकारों की भी बात करता है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह मामला भारत में एलजीबीटीक्यू+ (LGBTQ+) समुदाय के कानूनी अधिकारों के लिए एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। यदि अदालत इस याचिका को स्वीकार करती है, तो यह समलैंगिक जोड़ों को आपातकालीन चिकित्सा स्थितियों में कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा, जो वर्तमान में केवल विवाहित या रक्त संबंधों वाले व्यक्तियों तक सीमित है।

कानूनी मान्यता और चिकित्सा अधिकार अक्सर एक-दूसरे के पूरक होते हैं, और इस मामले का फैसला समानता की दिशा में एक मील का पत्थर होगा।

ऐतिहासिक रूप से, भारत में समलैंगिक संबंधों को लेकर कानून काफी जटिल रहे हैं। हालांकि 2018 में धारा 377 के हटने के बाद सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन नागरिक अधिकारों और चिकित्सा अधिकारों के मामले में अभी भी कानूनी शून्यता मौजूद है।

अदालत अब केंद्र सरकार से इस विषय पर उनके आधिकारिक रुख की मांग कर रही है। सरकार का जवाब यह तय करेगा कि क्या समलैंगिक जोड़ों को 'परिवार' के रूप में कानूनी मान्यता दी जाएगी या नहीं।

Did You Know?: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन विवाह और अन्य नागरिक अधिकारों पर फैसला सुरक्षित रखा था।

Frequently Asked Questions

1. क्या भारत में समलैंगिक लिव-इन रिलेशनशिप कानूनी है?
हाँ, दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, कानून दो पुरुषों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप पर रोक नहीं लगाता है।

2. मेडिकल कंसेंट (Medical Consent) का क्या महत्व है?
आपातकालीन स्थिति में, यदि कोई व्यक्ति निर्णय लेने में असमर्थ है, तो उसका साथी उसकी ओर से उपचार के लिए सहमति दे सकता है।