केरल उच्च न्यायालय ने स्तन कैंसर की महंगी दवाओं की कीमतों को चुनौती देने वाली याचिका में एक नए मरीज को शामिल करने की अनुमति दी है। यह मामला 'रिबोसिस्क्लिब' (Ribociclib) जैसी जीवन रक्षक दवाओं की पहुंच और पेटेंट को लेकर है।
- केरल हाईकोर्ट ने स्तन कैंसर के मरीज को कानूनी लड़ाई में शामिल करने की अनुमति दी।
- मामला 'रिबोसिस्क्लिब' नामक महंगी जीवन रक्षक दवा की कीमतों से संबंधित है।
- अदालत ने चिकित्सा संस्थानों को सस्ती वैकल्पिक दवाओं की जांच करने का निर्देश दिया है।
कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम उठाते हुए मलप्पुरम की एक स्तन कैंसर पीड़ित महिला को उस याचिका में शामिल होने की अनुमति दे दी है, जो जीवन रक्षक दवाओं की 'अत्यधिक' कीमतों के खिलाफ दायर की गई थी। यह मामला विशेष रूप से रिबोसिस्क्लिब (Ribociclib) नामक दवा की बढ़ती लागत और उसकी उपलब्धता से जुड़ा है।
यह कानूनी लड़ाई मूल रूप से एक अन्य मरीज द्वारा शुरू की गई थी, जो HR पॉजिटिव HER2-नेगेटिव मेटास्टैटिक ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थी। उस मरीज की याचिका में केंद्र सरकार से दवा का पेटेंट लेने और इसे न्यूनतम संभव कीमत पर उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। दुर्भाग्यवश, मामला अदालत में लंबित रहने के दौरान उस मरीज का निधन हो गया। अब, एक अन्य मरीज, जो समान स्थिति से जूझ रही है, इस कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ा रही है।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप
न्यायमूर्ति हरीशंकर वी. मेनन ने पाया कि चूंकि वर्तमान याचिकाकर्ता भी स्तन कैंसर से पीड़ित है और रिबोसिस्क्लिब का उपयोग कर रही है, इसलिए उसे मामले में एक पक्ष के रूप में जोड़ा जाना उचित है। अदालत ने इस मामले को जनहित में स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए भी आगे बढ़ाया है।
दवाओं की अत्यधिक कीमतें न केवल मरीजों पर आर्थिक बोझ डालती हैं, बल्कि उनके जीवन के अधिकार का भी उल्लंघन करती हैं।
अदालत ने नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (झज्जर), चित्तरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (कोलकाता), रीजनल कैंसर सेंटर (तिरुवनंतपुरम) और ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) को निर्देश दिया है कि वे यह जांचें कि क्या पल्बोसिस्क्लिब (Palbociclib) जैसी सस्ती दवाओं का उपयोग रिबोसिस्क्लिब के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।
विवाद का मुख्य बिंदु: क्या विकल्प सुरक्षित हैं?
दवा निर्माता कंपनियां, जैसे Eli Lilly and Company और Novartis AG, तर्क दे रही हैं कि पल्बोसिस्क्लिब एक सस्ता और प्रभावी विकल्प है। हालांकि, मामले में नियुक्त एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) ने इस पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि DCGI ने स्पष्ट रूप से यह नहीं कहा है कि पल्बोसिस्क्लिब रिबोसिस्क्लिब का सीधा विकल्प है। नैदानिक (clinical) और विषैले प्रोफाइल (toxicological profiles) अलग हो सकते हैं, इसलिए बिना डॉक्टरी परामर्श के इन्हें बदलना खतरनाक हो सकता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला भारत में फार्मास्युटिकल पेटेंट कानूनों और जीवन रक्षक दवाओं की सामर्थ्य (affordability) के बीच के संघर्ष को उजागर करता है। यदि अदालत पेटेंट के अधिग्रहण या वैकल्पिक दवाओं के उपयोग पर निर्णय लेती है, तो यह भविष्य में कैंसर उपचार की लागत को मौलिक रूप से बदल सकता है।
Frequently Asked Questions
1. यह मामला किस दवा के बारे में है?
यह मामला मुख्य रूप से स्तन कैंसर की दवा 'रिबोसिस्क्लिब' (Ribociclib) की अत्यधिक कीमतों से संबंधित है।
2. अदालत ने किन संस्थानों को निर्देश दिए हैं?
अदालत ने NCI झज्जर, CNCI कोलकाता, RCC तिरुवनंतपुरम और DCGI को दवाओं के विकल्पों की जांच करने का निर्देश दिया है।