बॉम्बे हाई कोर्ट ने बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) की उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है जिनमें स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को न्यूनतम वेतन देने का विरोध किया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'स्वयंसेवक' कहलाने के बावजूद, उनका कार्य स्वरूप नगर निगम के कर्मचारियों जैसा ही है।
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने बीएमसी (BMC) की याचिकाओं को खारिज किया।
- स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को अब न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के तहत वेतन पाने का अधिकार है।
- अदालत ने कहा कि 'मानदेय' (Honorarium) शब्द उन्हें न्यूनतम वेतन के दायरे से बाहर नहीं करता।
- नगर निगम को मौजूदा मानदेय और वैधानिक न्यूनतम वेतन के बीच के अंतर का भुगतान करना होगा।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए शुक्रवार को बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) द्वारा दायर उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवकों को न्यूनतम मजदूरी के पात्र के रूप में मान्यता देने वाले आदेश को चुनौती दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही इन कार्यकर्ताओं को 'स्वयंसेवक' (Swayamsevaks) के रूप में नामित किया गया हो, लेकिन उनके कार्य और जिम्मेदारियां पूरी तरह से नगर निगम के कर्मचारियों के समान हैं।
कार्य की प्रकृति और नियंत्रण
न्यायमूर्ति संदीप मार्ने की एकल पीठ ने बीएमसी के उन तर्कों को पूरी तरह से खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि स्वयंसेवकों और निगम के बीच कोई 'नियोक्ता-कर्मचारी' संबंध नहीं है। बीएमसी का तर्क था कि ये कार्यकर्ता केवल पांच घंटे काम करते हैं और उन्हें 14,000 रुपये का मानदेय दिया जाता है, जो उन्हें न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के दायरे से बाहर रखता है। हालांकि, अदालत ने पाया कि ये स्वयंसेवक निश्चित घंटों तक काम करते हैं, उपस्थिति दर्ज कराते हैं, और चिकित्सा कर्मचारियों के निर्देशों का पालन करते हैं, जो एक स्पष्ट रोजगार संबंध को दर्शाता है।
ऐतिहासिक संदर्भ और सामाजिक महत्व
यह मामला केवल वेतन तक सीमित नहीं है, बल्कि दशकों से चली आ रही एक व्यवस्था से जुड़ा है। ये स्वयंसेवक पिछले लगभग 38 वर्षों से नगर निगम के साथ जुड़े हुए हैं। वे स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों में सहायता करते हैं, सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों का समर्थन करते हैं, और विशेष रूप से झुग्गी-बस्तियों (Slum areas) में स्वास्थ्य केंद्रों और स्थानीय समुदायों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं।
अदालत का यह निर्णय उन लाखों अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए एक मिसाल है जिन्हें 'स्वयंसेवक' के लेबल के पीछे छिपाकर उनके कानूनी अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है।
BozokMedia विश्लेषण
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि यह निर्णय सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले अनौपचारिक श्रमिकों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी जीत है। बीएमसी द्वारा 'मानदेय' शब्द का उपयोग करके कानूनी दायित्वों से बचने की कोशिश को अदालत ने कानून की भावना के खिलाफ माना है। यह फैसला भविष्य में अन्य नगर निगमों और सरकारी निकायों के लिए एक नजीर बनेगा, जहाँ इसी तरह के 'स्वयंसेवक' मॉडल का उपयोग किया जाता है।
Frequently Asked Questions
1. क्या बीएमसी को अब पुराने बकाया का भुगतान करना होगा?
हाँ, अदालत ने नगर निगम को मौजूदा मानदेय और वैधानिक न्यूनतम वेतन के बीच के अंतर का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
2. स्वयंसेवकों को 'कर्मचारी' क्यों माना गया?
क्योंकि वे निश्चित घंटों तक काम करते हैं, उपस्थिति बनाए रखते हैं और उनके कार्यों पर नगर निगम का सीधा नियंत्रण होता है।