आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम और महाराष्ट्र के ठाणे में बड़े डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स के खिलाफ स्थानीय लोगों ने मोर्चा खोल दिया है। नागरिक समूह पानी की कमी, पर्यावरणीय नुकसान और संसाधनों के अत्यधिक दोहन को लेकर चिंतित हैं।
मुख्य बातें
- विशाखापत्तनम में गूगल और अडानी के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट का भारी विरोध।
- ठाणे में अमेज़न के हाइपरस्केल डेटा सेंटर के खिलाफ स्थानीय निवासियों का प्रदर्शन।
- मुख्य चिंताएं: पानी की कमी, बिजली का लोड और पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) को नुकसान।
- पर्यावरणविदों का तर्क है कि डेटा केंद्रों से स्थानीय रोजगार और लाभ बहुत कम मिलेगा।
भारत के दो प्रमुख राज्यों, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में तकनीकी विकास और स्थानीय संसाधनों के बीच एक बड़ा संघर्ष छिड़ गया है। विशाखापत्तनम में गूगल (Raiden Infotech) और अडानी समूह द्वारा प्रस्तावित 1GW एआई डेटा सेंटर हब और ठाणे में अमेज़न के विशाल प्रोजेक्ट ने स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है।
विरोध के मुख्य कारण: संसाधन बनाम तकनीक
विशाखापत्तनम में, विरोध का मुख्य केंद्र सुपर अल नीनो जैसे मौसम पैटर्न के कारण पैदा हुई पानी की किल्लत है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि डेटा केंद्रों को ठंडा करने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जो शहर के पीने के पानी के स्रोतों जैसे मुडासरलोवा जलाशय के लिए खतरा बन सकता है। इसके अलावा, कंबालकोंडा इको-फॉरेस्ट और रामबिल्ली वन्यजीव अभयारण्य जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्रों को भी नुकसान पहुँचने का डर है।
बोजोकमीडिया विश्लेषण (BozokMedia analysis shows...)
बोजोकमीडिया विश्लेषण से पता चलता है कि यह विरोध केवल तकनीक के खिलाफ नहीं है, बल्कि 'अनियोजित विकास' के खिलाफ है। नागरिक समूह तर्क दे रहे हैं कि डेटा केंद्रों के लिए दी जा रही भारी रियायतें और भूमि के बदले स्थानीय लोगों को मिलने वाले लाभ (जैसे स्थायी रोजगार) बहुत ही सीमित हैं।
तकनीकी प्रगति आवश्यक है, लेकिन यह स्थानीय पारिस्थितिकी और जल सुरक्षा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
महाराष्ट्र के ठाणे में, 'वेकअप ठाणेकर' जैसे नागरिक समूहों ने अमेज़न के प्रोजेक्ट पर सवाल उठाए हैं। निवासियों का कहना है कि पहले से ही पानी की कमी और बिजली कटौती (Load shedding) से जूझ रहे क्षेत्रों में इतने बड़े डेटा सेंटर का निर्माण करना आत्मघाती हो सकता है। उन्होंने पानी के उपयोग के आंकड़ों में विसंगतियों और सार्वजनिक सुनवाई की कमी पर भी चिंता जताई है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में डेटा सेंटर का विस्तार तेजी से हो रहा है क्योंकि डिजिटल अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर डेटा केंद्रों के निर्माण ने जल संसाधनों और भूमि उपयोग को लेकर बहस छेड़ दी है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पहले से ही जलवायु परिवर्तन के कारण पानी का संकट है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. लोग डेटा केंद्रों का विरोध क्यों कर रहे हैं?
मुख्य रूप से पानी की कमी, बिजली पर दबाव, पर्यावरण का विनाश और स्थानीय लोगों को मिलने वाले सीमित लाभ के कारण।
2. क्या इन परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक सुनवाई अनिवार्य है?
नागरिक समूहों का दावा है कि कई मामलों में पारदर्शिता की कमी है और आवश्यक पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन और सार्वजनिक परामर्श की अनदेखी की जा रही है।