सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गड्करी ने ई20 ईथनोल मिश्रित पेट्रोल को लेकर लगातार चल रही ऑनलाइन बदनामी के खिलाफ कानूनी कदम उठाए। बॉम्बे हाई कोर्ट में मेटा, X और गूगल के खिलाफ दीवानी याचिका दायर की गई है।
मुख्य बिंदु
- गड्करी ने मेटा, X, गूगल के खिलाफ दोषारोपण का मुकदमा दायर किया
- ई20 नीति को पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा चलाया जाता है, गड्करी नहीं
- ऑनलाइन डीपफेक और AI‑जनित वीडियो ने मंत्री की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया
पृष्ठभूमि
2026 में सरकार ने 20% इथनोल (E20) को डिफ़ॉल्ट ईंधन बनाने का निर्णय लिया, जिससे पेट्रोल की आयातित मात्रा घटेगी। इस नीति को लेकर विपक्षी दलों ने लगातार आरोप लगाए कि गड्करी के परिवार के व्यवसायी ईथनोल उत्पादन में शामिल हैं, जिससे हितों का टकराव पैदा हुआ।
विवाद का विस्तार
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 27 जुलाई को गड्करी को मेटा प्लेटफ़ॉर्म्स, X कॉर्प, गूगल और अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ एक सिविल याचिका दायर करने की अनुमति दी। सुनवाई 5 अगस्त को निर्धारित है। गड्करी का मुख्य तर्क है कि वह E20 नीति का निर्माता या लाभार्थी नहीं है; यह पूरी तरह से पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का कार्यक्षेत्र है।
क्यों यह महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि बड़े डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म की जिम्मेदारी तय करना भारत में ऑनलाइन अभद्र सामग्री के नियंत्रण के लिए एक नई दिशा स्थापित करेगा। यह मामला सोशल मीडिया पर उत्पन्न नकली वीडियो और डीपफ़ेक को रोकने के लिए क़ानूनी ढाँचा तैयार करने में मददगार हो सकता है।
"डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता; उन्हें सच्चाई को बचाने की कानूनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए," कहा मीडिया विशेषज्ञ अंजली सिंह ने।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ईथनोल मिश्रित पेट्रोल का प्रयोग 1990 के दशक से भारत में धीरे‑धीरे बढ़ा है, लेकिन 2020 के बाद सरकार ने इसे तेज़ी से बढ़ाने का लक्ष्य रखा। इस नीति को लेकर कई बार संसद में प्रश्न उठे हैं, परन्तु गड्करी के मंत्रालय ने केवल तीन ही प्रश्नों का उत्तर दिया, जबकि पेट्रोलियम मंत्रालय ने 15 प्रश्नों का विस्तृत उत्तर दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या गड्करी की याचिका से सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर प्रतिबंध लगेगा?
उत्तर: अभी तय नहीं हुआ; कोर्ट का फैसला इस पर निर्भर करेगा।
प्रश्न 2: क्या ई20 नीति को रद्द किया जा सकता है?
उत्तर: नीति को बदलने के लिए संसद में बहस और मंजूरी आवश्यक होगी।