केंद्रीय जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गा दास उइके ने राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय भाषाओं, परम्पराओं और सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कर्नाटक के मैसूर को इस चर्चा के लिए उपयुक्त मंच कहा और भविष्य में समावेशी विकास के लिए जनजातीय समुदायों की भागीदारी को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।

  • जनजातीय भाषाओं के निधन से सांस्कृतिक ज्ञान भी खो जाता है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर दस्तावेज़ीकरण और पुनरुज्जीवन की तत्काल आवश्यकता है।
  • विकसित भारत के लक्ष्य में जनजातीय समुदायों को बराबर स्थान मिलना चाहिए।

सेमिनार का उद्घाटन और मुख्य संदेश

केंद्रीय जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गा दास उइके ने बेंगलुरु में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार "जनजातीय भाषाएँ और संग्रहालय" का उद्घाटन किया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भाषा संरक्षण, संग्रहालयों की भूमिका और जनजातीय ज्ञान प्रणालियों पर चर्चा करना था। उइके ने कहा कि मैसूर की राजवंशीय विरासत, कला, साहित्य और लोक परम्पराएँ इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए आदर्श स्थान हैं।

भाषा संरक्षण की आवश्यकता

उइके ने बताया कि कई जनजातीय भाषाएँ गंभीर रूप से खतरे में हैं और उनका लुप्त होना केवल भाषा नहीं, बल्कि उस समुदाय की परम्पराएँ, ज्ञान और इतिहास भी खो देता है। उन्होंने कहा कि संग्रहालयों में भाषा, परम्पराओं और स्वतंत्रता संग्रामियों की कहानियों को संकलित करके राष्ट्रीय पहचान को सुदृढ़ किया जा सकता है।

प्रकृति और पारंपरिक ज्ञान के बीच संबंध

उइके ने जनजातीय समुदायों के प्रकृति के साथ घनिष्ठ संबंध को उजागर किया और कहा कि आधुनिक समाज में रसायन आधारित कृषि और नदियों का प्रदूषण इन पारंपरिक जीवनशैलियों को खतरे में डाल रहा है। उन्होंने कहा, "जनजातीय लोग प्राचीन ज्ञान के संरक्षक हैं और हमें उनके साथ संतुलन बनाकर चलना चाहिए।"

विकसित भारत में जनजातीय भूमिका

तीन दिवसीय कार्यशालाओं में उइके ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में जनजातीय समुदायों को समान अवसर और विकास में भागीदारी मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि भाषा संरक्षण केवल भाषा बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और विरासत की रक्षा भी है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that neglecting tribal languages accelerates cultural erosion, which undermines social cohesion and hampers India’s goal of inclusive growth. Preserving these languages not only safeguards intangible heritage but also enriches the nation’s linguistic diversity, a critical asset in a globalized economy.

"जनजातीय भाषाओं का संरक्षण राष्ट्रीय पहचान का एक अनिवार्य हिस्सा है," प्रो. अंबिका राव, सामाजिक विज्ञान विशेषज्ञ ने कहा।
Did You Know?: भारत में लगभग 700 से अधिक जनजातीय भाषाएँ हैं, जिनमें से 30% से अधिक को लुप्त होने का खतरा है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: सरकार किन कदमों से जनजातीय भाषाओं को संरक्षित कर सकती है?

उत्तर: व्यापक भाषा प्रोफ़ाइल बनाना, शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल करना, डिजिटल अभिलेख बनाना और स्थानीय समुदायों को दस्तावेज़ीकरण में सक्रिय भूमिका देना।

प्रश्न 2: आम जनता इन प्रयासों में कैसे योगदान दे सकती है?

उत्तर: स्थानीय भाषा सीखना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेना और जनजातीय कलाकारों तथा शिल्पकारों के कार्यों को समर्थन देना।