जनगणना 2027 में दिव्यांग व्यक्तियों के लिए पूछे जाने वाले प्रश्नों में कई गंभीर खामियाँ हैं, जिससे लाखों लोगों को राज्य की सहायता से वंचित किया जा सकता है। यह लेख इस समस्या की जड़ें, प्रभाव और संभावित समाधान का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

  • डिसएबिलिटी डेटा में बड़ी कमी
  • सही वर्गीकरण की अनुपस्थिति
  • वित्तीय आवंटन पर गंभीर असर

पृष्ठभूमि

भारत में जनगणना हर दस साल में एक बार आयोजित की जाती है। 17 अगस्त को जम्मू‑कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के बर्फीले जिलों में स्व-गणना शुरू हुई, जबकि द्वार‑दर द्वार गिनती 1 सितंबर से शुरू होगी और राष्ट्रीय गिनती फरवरी 2027 में होगी।

वर्तमान प्रश्नावली में की गई त्रुटियाँ

गृह मंत्रालय ने 40 प्रश्नों की सूची जारी की है, जिनमें 13वां प्रश्न दिव्यांगता से संबंधित है। 13(a) में पूछा जाता है कि क्या उत्तरदाता दिव्यांग है, और सकारात्मक उत्तर पर 13(b) में नौ विकल्पों में से अधिकतम तीन चुनने को कहा गया है – दृष्टि, श्रवण, भाषण, गतिशीलता, बौद्धिक दिव्यांगता, मानसिक रोग, एसिड अटैक, पुरानी न्यूरोलॉजिकल बीमारी और रक्त रोग।

ऐतिहासिक तुलना

सालवर्गीकरण की संख्या
20118
20279 (रक्त रोग जोड़ दिया गया)

हालांकि वर्गीकरण में एक वृद्धि देखी गई, लेकिन 2016 के "विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम" में मान्य 21 स्थितियों में से केवल नौ ही प्रश्नावली में शामिल हैं। यह अंतर न केवल डेटा की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बजट को भी विकृत करता है।

डेटा अभाव के व्यावहारिक परिणाम

उदाहरण के तौर पर, ऑटिज़्म को बौद्धिक दिव्यांगता के तहत गिनना न केवल त्रुटि को दोहराता है, बल्कि प्रभावित व्यक्तियों को अनुचित सेवाओं की ओर मोड़ता है। इसी तरह, थैलेसीमिया, हेमोफीलिया और सिकल सेल रोग जैसी रक्त विकारों को एक ही "रक्त रोग" श्रेणी में समेटना इन रोगों के लिए आवश्यक विशिष्ट उपचारों को आँकड़े से बाहर कर देता है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that without granular disability data, state and central governments cannot allocate targeted funds, leading to systemic neglect of millions of disabled citizens across remote districts.

“Accurate census data is the backbone of inclusive policy; any omission magnifies inequality.” – Dr. Anita Sharma, Disability Rights Advocate

निराकरण के संभावित कदम

यूनिक डिसएबिलिटी आईडी (UDID) डेटाबेस को पूरी तरह से एकीकृत करना, तथा सर्वेक्षणकर्ताओं को बौद्धिक और न्यूरोलॉजिकल स्थितियों की पहचान के लिए विस्तृत प्रशिक्षण देना अनिवार्य है। इसके अलावा, बहु‑विकलांगता विकल्प को पुनः स्थापित करना चाहिए ताकि जटिल मामलों का सही रिकॉर्ड रखा जा सके।

Did You Know?: भारत में केवल लगभग 50% दिव्यांग लोग ही UDID पोर्टल पर पंजीकृत हैं, जिससे आधे से अधिक की पहचान ही नहीं होती।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या 2027 की जनगणना में ऑटिज़्म को अलग से गिना जाएगा?

उत्तर: नहीं, इसे अभी भी बौद्धिक दिव्यांगता के तहत ही वर्गीकृत किया गया है।

प्रश्न 2: जनगणना डेटा की कमी का सबसे बड़ा प्रभाव कौन-सा है?

उत्तर: यह सीधे तौर पर दिव्यांग कल्याण योजनाओं के बजट को घटाता है, जिससे आवश्यक चिकित्सा और शिक्षण सेवाएँ नहीं पहुँच पातीं।