भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के शोध ने दिखाया कि हिमालय के ग्लेशियर सिर्फ दो वर्षों में 30% से अधिक पीछे हट चुके हैं। छोटे ग्लेशियर 1962 से 38% क्षेत्र खो चुके हैं, और वैश्विक गर्मी इस पिघलने को तेज़ कर रही है। यह जल सुरक्षा और कृषि पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

  • हिमालय के ग्लेशियर सिर्फ दो वर्षों में 30% से अधिक पीछे हट चुके हैं।
  • छोटे ग्लेशियर 1962 से 38% क्षेत्र खो चुके हैं।
  • वैश्विक गर्मी तेज़ी से पिघलने का कारण है, जिससे जल सुरक्षा खतरे में है।
\n

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के स्पेस एप्लिकेशन सेंटर (SAC) के शोधकर्ताओं ने 2006 में हिमालय के सबसे बड़े ग्लेशियरों का विस्तृत मानचित्रण किया।

\n

सामुद्र टपू ग्लेशियर, जो लाहौल-स्पिटी क्षेत्र में दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर है, 13,600 फीट ऊंचाई पर स्थित है और चंद्र नदी का मुख्य स्रोत है।

\n

संकटपूर्ण चढ़ाई के बाद, टीम ने जमीनी और उपग्रह दोनों तरीकों से ग्लेशियर की रेखा को मापा, जिससे पता चला कि केवल दो वर्षों में ग्लेशियर 30 मीटर पीछे हट चुका है और 1960 से लगभग 800 मीटर।

\n

इस अध्ययन के अनुसार, 466 ग्लेशियरों में कुल 21% की कमी हुई है, जबकि ग्लेशियरों की संख्या बढ़ी है क्योंकि बड़े ग्लेशियर छोटे हिस्सों में बंट रहे हैं।

\n

IPCC के अनुसार, वैश्विक तापमान 1.4 से 5.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जिससे भारत के जल संसाधन और कृषि पर गहरा असर पड़ेगा।

\n

साक्ष्य बताते हैं कि हिमालय के ग्लेशियर पिघलने से नदियों की धारा बदल सकती है, जिससे सिंचाई और ऊर्जा उत्पादन में व्यवधान हो सकता है।

\n

Why This Matters

\n

BozokMedia विश्लेषण बताता है कि ग्लेशियरों का पिघलना न केवल जल संकट को बढ़ाएगा बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्थिरता पर भी असर डालेगा।

\n
हिमालय के पिघलते ग्लेशियर जल सुरक्षा के लिए एक गंभीर चेतावनी हैं, और हमें जल प्रबंधन तथा नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को तेज़ी से बढ़ाना चाहिए।
\n
Did You Know?: हिमालय के ग्लेशियर विश्व की कुल ताजा पानी की भंडारण का लगभग 20% हिस्सा रखते हैं।
\n

Frequently Asked Questions

\n

1. क्या ग्लेशियर पिघलना केवल हिमालय में ही हो रहा है?

\n

नहीं, ग्लेशियर पिघलना दुनिया भर में हो रहा है, जिसमें अंटार्कटिका, एंडीज़ और अल्प्स भी शामिल हैं।

\n

2. भारत सरकार ग्लेशियर पिघलने से निपटने के लिए क्या कदम उठा रही है?

\n

भारत सरकार ने जल संरक्षण और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए फंडिंग बढ़ाई है, साथ ही ग्लेशियर निगरानी कार्यक्रमों को भी मजबूती दी है।