झारखंड के प्राथमिक शिक्षकों के संघ ने सुप्रीम कोर्ट के टेट आदेश पर विरोध जताते हुए 22 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन भूख‑हड़ताल शुरू करने की घोषणा की। यह कदम राइट‑टू‑एडुकेशन एक्ट के पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए लागू टेट आवश्यकता पर सवाल उठाता है।
- टेट आदेश के तहत 25,000 से अधिक झारखंड शिक्षकों पर प्रभाव पड़ेगा।
- संघ ने विधानसभा को रेसोल्यूशन पारित करने और केंद्र को संबोधित करने का आग्रह किया।
- अनिश्चितकालीन भूख‑हड़ताल 22 अक्टूबर से शुरू होगी।
झारखंड के प्राथमिक शिक्षकों के संघ ने सुप्रीम कोर्ट के टेट (Teacher Eligibility Test) आदेश के विरुद्ध विधानसभा रेसोल्यूशन का आग्रह करते हुए 22 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन भूख‑हड़ताल की घोषणा की। यह कदम 2009 के राइट‑टू‑एडुकेशन एक्ट से पहले नियुक्त शिक्षकों पर टेट की अनिवार्यता को चुनौती देता है।
पृष्ठभूमि
1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि मार्च 2015 तक सेवा में रहे शिक्षकों को दो साल के भीतर टेट उत्तीर्ण करना अनिवार्य है। मूल समय सीमा अगस्त 2027 थी, जिसे बाद में अगस्त 2028 तक बढ़ाया गया। यह आदेश लगभग 2.5 लाख शिक्षकों को प्रभावित करता है, जिनमें झारखंड के लगभग 25,000 सरकारी शिक्षक भी शामिल हैं।
शिक्षक क्यों विरोध कर रहे हैं?
शिक्षक संगठनों का तर्क है कि टेट का प्रावधान पूर्व‑राइट‑टू‑एडुकेशन एक्ट के शिक्षकों पर पीछे की तारीख से लागू नहीं होना चाहिए। टीएफआई के अनुसार, 2010 के NCTE अधिसूचना ने केवल भविष्य के नियुक्तियों के लिए न्यूनतम योग्यता तय की थी, और पूर्व नियुक्त शिक्षकों को पहले से ही मानक योग्यता प्राप्त थी।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह हड़ताल न केवल शिक्षा क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है, बल्कि भारत के शैक्षिक सुधारों पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है। यदि टेट की अनिवार्यता को लागू किया गया, तो लाखों अनुभवी शिक्षकों को नौकरी से वंचित होने या पदोन्नति से वंचित होने का सामना करना पड़ेगा।
"यह निर्णय शिक्षकों के पेशेवर अधिकारों पर गहरा असर डाल सकता है, और यदि इसे बिना उचित परामर्श के लागू किया गया, तो यह शैक्षिक गुणवत्ता पर भी असर डाल सकता है," - प्रो. राधाकृष्णन, शिक्षा नीति विशेषज्ञ।
Frequently Asked Questions
- क्या टेट अनिवार्य होने से शिक्षकों को नौकरी से निकाला जा सकता है?
- झारखंड सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठा रही है?