भारत में कोटा के मातृ मृत्यु मामले की जांच में दीनोप्रोस्टोन जेल को गुणवत्ता परीक्षण में असफल पाया गया। यह रिपोर्ट दवा की कमी, नियामक निगरानी और स्वास्थ्य प्रणाली की चुनौतियों को उजागर करती है।

भारत के राजस्थान राज्य में कोटा शहर में हाल ही में हुई मातृ मृत्यु की श्रृंखला ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य तंत्र की कमजोरियों को फिर से उजागर किया है। भारत टुडे द्वारा किए गए विस्तृत सर्वेक्षण में पाया गया कि प्रारम्भिक जांच में उपयोग की गई दो प्रमुख दवाओं में से एक, दीनोप्रोस्टोन जेल, ने गुणवत्ता परीक्षण में गंभीर कमी दिखाई।

पृष्ठभूमि और जांच की रूपरेखा

कोटा में पिछले दो वर्षों में 30 से अधिक गर्भवती महिलाओं की मृत्यु हुई, जिनमें कई मामलों में प्रसव के दौरान या उसके बाद जटिलताएँ सामने आईं। प्रारम्भिक जांच में दो दवाओं – एक प्रॉस्टाग्लैंडिन (इंड्यूसर) और दूसरा दीनोप्रोस्टोन जेल – को संभावित कारण माना गया। जबकि पहली दवा के बारे में पहले ही सुरक्षा चेतावनी जारी की जा चुकी थी, नई रिपोर्ट में दीनोप्रोस्टोन जेल की भी समान समस्या सामने आई।

गुणवत्ता परीक्षण के परिणाम

राजस्थान के राज्य दवा नियंत्रण विभाग (SDC) द्वारा किए गए स्वतंत्र लैब परीक्षण में दीनोप्रोस्टोन जेल में सक्रिय घटक की सांद्रता मानक सीमा से 30% तक कम पाई गई। साथ ही, जेल में अनधिकृत मिलावट, असमान कण आकार और अपर्याप्त स्थिरता भी दर्ज की गई। ये परिणाम न केवल दवा की चिकित्सीय प्रभावशीलता को कमजोर करते हैं, बल्कि संभावित प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं का जोखिम भी बढ़ाते हैं।

नियामक और प्रशासनिक प्रतिक्रिया

जांच के बाद, राजस्थान सरकार ने तुरंत दीनोप्रोस्टोन जेल के सभी बैचों को बाजार से वापस बुलाने का आदेश जारी किया। साथ ही, राज्य स्वास्थ्य विभाग ने सभी सार्वजनिक अस्पतालों में इस दवा के उपयोग को निलंबित कर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर, भारतीय औषधि नियामक प्राधिकरण (CDSCO) ने इस मामले को "उच्च प्राथमिकता" के तहत रखा है और अतिरिक्त परीक्षण एवं पुनः प्रमाणन प्रक्रिया शुरू कर दी है।

सिस्टमिक चुनौतियां और भविष्य की दिशा

कोटा मामले में दो बार दवा की गुणवत्ता में खामियां आने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत में दवा आपूर्ति श्रृंखला, विशेषकर ग्रामीण एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, अभी भी पर्याप्त निगरानी से वंचित है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुदृढ़ क्वालिटी कंट्रोल, रियल‑टाइम ट्रैकिंग और स्थानीय उत्पादन पर अधिक भरोसा करने की आवश्यकता है। इसके अलावा, स्वास्थ्य कर्मियों को दवा चयन और उपयोग के बारे में निरंतर प्रशिक्षण देना, मातृ मृत्यु को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

रोगी और परिवारों की आवाज़

पिछले कई महीनों से प्रभावित परिवारों ने न्याय की माँग की है। वे न केवल दोषी दवाओं के निर्माता को उत्तरदायी ठहराना चाहते हैं, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली की व्यापक सुधार की भी मांग कर रहे हैं। कई NGOs ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने और सरकार से पारदर्शी रिपोर्टिंग की माँग की है।

कोटा मातृ मृत्यु जांच का परिणाम इस बात का संकेत देता है कि दवा सुरक्षा और नियामक अनुपालन को प्राथमिकता देना, भारत के स्वास्थ्य लक्ष्य – विशेषकर सतत विकास लक्ष्य 3 (सभी के लिए स्वस्थ जीवन) – को हासिल करने में अनिवार्य है।