गाज़ियाबाद के यशोदा सुपरस्पेशालिटी अस्पताल में कोलन कैंसर के उपचार के दौरान बीमा कंपनी ने अनधिकार नीति रद्द कर दी, जिससे रोगी को भारी नुकसान हुआ। उपभोक्ता विवाद आयोग ने अस्पताल और नाइवा बुपा को सेवा की कमी के लिए दंडित कर ₹11.63 लाख के साथ ब्याज और क्षतिपूर्ति का आदेश दिया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • बीमा कंपनी ने रोगी की पॉलिसी अनधिकार रद्द की, जिससे कैंसर उपचार में बाधा आई।
  • अस्पताल ने अनियमित बिलिंग और रोगी को जबरन भुगतान करवाया।
  • उपभोक्ता आयोग ने कुल ₹12.35 लाख (ब्याज व क्षतिपूर्ति सहित) का भुगतान आदेशित किया।

गाज़ियाबाद स्थित यशोदा सुपरस्पेशालिटी अस्पताल में कोलन कैंसर का निदान हुआ रोगी ने नाइवा बुपा हेल्थ इन्श्योरेन्स से कैशलेस उपचार के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज़ प्रस्तुत किए। हालांकि, बीमा कंपनी ने 20‑30 % कोरोनरी स्टेनोसिस का हवाला देते हुए पॉलिसी रद्द कर दी, जबकि यह स्थिति कैंसर उपचार से असंबंधित थी।

पृष्ठभूमि और घटना का क्रम

रोगी ने 30 अगस्त 2024 से 29 अगस्त 2025 तक की अवधि के लिए नाइवा बुपा से स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदी थी। 2022 में पीठ दर्द के कारण मेडिकल कंसल्टेशन के दौरान उसने सभी मौजूदा रिपोर्टें बीमा कंपनी को दिखा दी थीं। 2025 की मार्च‑अप्रैल में कोलन कैंसर का पता चलने पर वह अस्पताल में भर्ती हुआ और कुल खर्च ₹5.36 लाख से अधिक हुआ।

अस्पताल और बीमा कंपनी की अनियमितताएँ

बीमा कंपनी ने पॉलिसी रद्द कर दी, जबकि रोगी ने बताया कि कोरोनरी स्टेनोसिस का इलाज संभव है और यह कैंसर उपचार से असंबंधित है। अस्पताल ने बिना GST विवरण के बिल जारी किए, रोगी को भुगतान न करने पर जबरन हिरासत में रखा, तथा दवाओं और उपचार पर मनमाने शुल्क लगाए। 9 अप्रैल 2025 की दूसरी भर्ती में अस्पताल ने आधिकारिक रूप से स्वीकृत राशि ₹3.80 लाख के बावजूद ₹5.72 लाख ले लिया।

उपभोक्ता आयोग का निर्णय

गुड़गांव डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमिशन ने यशोदा अस्पताल, नाइवा बुपा और संबंधित कर्मचारियों को सेवा में कमी का दोषी ठहराया। आयोग ने कुल ₹11.63 लाख के साथ 9 % ब्याज, ₹50,000 की क्षतिपूर्ति और ₹22,000 के मुकदमे खर्च की भरपाई का आदेश दिया। साथ ही बीमा पॉलिसी को उसके प्राकृतिक समाप्ति तक जारी रखने और 45 दिन में भुगतान न होने पर अतिरिक्त 12 % ब्याज लागू करने का निर्देश दिया गया।

भविष्य के लिए प्रभाव

यह निर्णय इस बात को स्पष्ट करता है कि अस्पताल और बीमा कंपनियां उपभोक्ता विवाद में अनुपस्थिति के माध्यम से दायित्व से बच नहीं सकते। अनधिकृत पॉलिसी रद्दीकरण, वास्तविक मेडिकल क्लेम को नकारना और मनमाना बिलिंग अब उपभोक्ता मंचों में गंभीर सेवा कमी के रूप में माना जाएगा। समान समस्याओं का सामना करने वाले रोगी अब राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (1915) या राज्य-विशिष्ट हेल्पलाइन (उदाहरण: हरियाणा 1800‑180‑2087) के माध्यम से मदद ले सकते हैं।